Monday, March 5, 2018
गुंडे-मवाली
Wednesday, February 28, 2018
मानवाधिकार
"मानवाधिकार वाले रज्जो की ज़िंदगी तो नहीं सुधार सकते थे न.”
Saturday, February 24, 2018
जेबकतरे
Tuesday, February 20, 2018
भजिया-पकौड़े वाला
गरम नींबू-पानी के कटोरे में हाथ धोकर गीले सुगंधित तौलिये से हाथ मुंह पोंछते हुए देवेश ने कहा, “भोजन सचमुच बहुत स्वादिष्ट था।“ सुनकर मुझे ऐसे प्रसन्नता हुई जैसे यह भोजन मैंने स्वयं बनाया हो।
मैं मुंबई में एक बैंक में कार्यरत था और मेरा छोटा भाई देवेश मुझसे मिलने मेरे पास आया हुआ था। कहने को कैरियर की दृष्टि से मैं एक सफल व्यक्ति था। लाखों-करोड़ों युवाओं का स्वप्न था बैंक में पी॰ओ॰ की नौकरी पाना। मेरा भी यह स्वप्न था और मैं इस स्वप्न को साकार कर चुका था। मेरे परिवार को गर्व था मेरी इस उपलब्धि पर। मेरा छोटा भाई भी मुझसे बहुत प्रभावित था और मेरी ही तरह एक पी॰ओ॰ बनाना चाहता था। मैं खुश था कि मेरा भाई मेरे पास रहने आया था। मैं चाहता था कि वह नज़दीक से देखे मेरा जीवन और उसके बाद अपने भविष्य के बारे में निर्णय ले।
मेरी नियुक्ति मुंबई फोर्ट क्षेत्र की एक शाखा में हुई थी। शुरू के दिनों में होटल में रुका जो बहुत महंगा था। फिर एक लॉज में ठहरा। कुछ दिनों बाद लॉज भी जेब को कचोटने लगी। एक चॉल में भी रुका, परंतु वहाँ एक दिन से अधिक ठहरा नहीं गया। चर्च गेट से विरार तक और वी॰टी॰ से लेकर ठाणे तक सभी क्षेत्रों में विकल्प तलाश मारे परंतु कहीं बात नहीं बनी।
तब से मैं वहीं कांदीवली में ही रह रहा था। बहुत सुविधाजनक नहीं था, परंतु उससे बेहतर कोई उपाय था भी नहीं। एक रोज़ मेरे वरिष्ठ सहयोगी के पिताजी आए, तो वे दो दिन उनके छोटे भाई ने मेरे कमरे में दीवान के साथ ज़मीन पर बिछौना लगाकर बिताए। एक छोटी मेज़ थी जिसे ज़मीन पर बिछौना बिछाने की जगह बनाने के लिए दीवार के साथ चिपका दिया जाता और दो फोल्डिंग कुरसियों को भीतर वाले कमरे में ले जाया जाता। बस उतनी ही जगह थी उस कमरे में।
सुबह हम कांदीवली स्टेशन तक ऑटो में जाते। वहाँ से उलटी दिशा में बोरीवली के लिए ट्रेन पकड़ते। फिर बोरीवली से फ़ास्ट या डबल फ़ास्ट ट्रेन लेकर चर्चगेट जाते। कभी-कभी भाई को मैं रास्ते में बांद्रा या दादर उतार देता, आसपास की कोई जगह देखने के लिए। कान्दीवली से उलटे बोरीवली जाने के दो लाभ होते। एक तो बोरीवली से फ़ास्ट या डबल फ़ास्ट ट्रेन मिल जाती, जो कान्दीवली में रुकती ही नहीं थीं। दूसरे, जिस ट्रेन में बोरीवली जाओ, उसी में बैठे रहो। मुंबई लोकल में सीट पाने वाला राजा होता है, बाकी सब धक्के खाने वाली प्रजा। बोरीवली से चढ़ने वालों को भी अक्सर सीट नहीं मिलती थी।
आज मैं अपने भाई को एक विशेष रैस्टौरेंट में लेकर आया था। “यह मेरे एक सीनियर का रैस्टौरेंट है,” मैंने उसे बताया था।
“क्या वह भी बैंक में काम करते हैं,” देवेश का यह एक स्वाभाविक प्रश्न था।
“अरे, बैंक में काम करते तो किसी लॉकर में चाभी घुमा रहे होते या किसी कस्टमर से सिर खपा रहे होते,” मैंने उत्तर दिया।
“तो क्या छोड़ दी उन्होंने नौकरी?”
“उनकी नौकरी लगी ही नहीं,” मेरा उत्तर था।
देवेश की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा, “फिर वह आपके सीनियर कैसे?”
मैं पहली बार ऐसी कोई परीक्षा दे रहा था और वह तीन साल में ऐसी अनेक परीक्षाएँ दे चुके थे, इस नाते वे मेरे सीनियर थे। उसके बाद से मैं उनके संपर्क में रहने लगा, फ़ोन के माध्यम से भी और व्यक्तिगत मुलाकातों से भी। वह मेरे मार्गदर्शक बन गए थे। वही बताते कि क्या पढ़ना है, किस स्रोत से पढ़ना है और किस विषय में अधिक समय नहीं गंवाना है। लगता था वह न केवल विषयवस्तु के ज्ञाता थे वरन परीक्षा-कला में भी पारंगत थे। फिर उनका चयन क्यों नहीं होता था? बहुत संकोच के साथ यह प्रश्न मैं उनसे भी करता और उत्तर में वह मुस्कुरा भर देते। उनकी मुस्कान के पीछे का दर्द मैं समझ सकता था। उनके मार्गदर्शन से लाभान्वित होकर अनेक लोग आज विभिन्न बैंकों की सेवाओं में थे। परंतु वह आज भी कतार में खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे अपने चयन की।
एक बार उन्होंने बातों-बातों में मुझसे कह ही दिया कि यह उनका अंतिम प्रयास है, बैंक सेवा की परीक्षा का। उनकी बात सुनकर मुझे बहुत निराशा हुई। मैं उनके लिए प्रार्थना करने लगा। साथ ही मुझे यह भी लगने लगा कि जब इतने प्रतिभाशाली व्यक्ति का चयन नहीं हो रहा है तो मेरे चयन की तो संभावना ही नहीं थी। मैंने पूरे मनोयोग के साथ तैयारी शुरू कर दी। मनोज, यद्यपि अपनी लगातार असफलता से हतोत्साहित थे, मेरी सहायता करने में उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।
परीक्षा हुई, इंटरव्यू राउंड हुआ, सेवा के लिए मेरा चयन हो गया परंतु मनोज का चयन इस बार भी नहीं हुआ। मनोज ने मुसकुराते हुए मुझे गले लगाकर बधाई दी परंतु उनकी मुस्कान के पीछे मैं उनका दर्द अनुभव कर रहा था। “तुम मेरी चिंता मत करना। ईश्वर ने मेरे लिए कुछ और योजना बना रखी होगी,” एक दार्शनिक की भांति मनोज बोले।
एक वर्ष की ट्रेनिंग के बाद मेरे नियुक्ति मुंबई फोर्ट की एक शाखा में हुई। मैंने मुंबई शहर के बारे में सुन रखा था कि उस शहर में बाहर के व्यक्ति का निर्वहन बहुत कठिन है और कोई वहाँ नियुक्ति नहीं चाहता। परंतु यह भी सुन रखा था कि एक बार यदि कोई मुंबई में रह जाए कुछ साल, तो उस शहर को छोड़ना नहीं चाहता।
“आज मनोज के चार रेस्टॉरेन्ट हैं मुम्बई शहर में और उनमें से एक में हमने अभी-अभी भोजन किया है,” कहकर मैंने अपनी बात समाप्त की और एक लंबी सांस ली।
"काश, आपका भी सेलेक्शन पी.ओ. के इम्तिहान में न हुआ होता...” देवेश बुदबुदा रहा था।
नज़दीक से
- विक्रम शर्मा
Wednesday, December 29, 2010
सुख
मैं एक व्यवसायी हूँ. एक सफल व्यापारी. व्यापार के कायदे कानून ठीक से जानता हूँ. कुछ लोग मुझे पसन्द नहीं करते, पीठ पीछे मेरी बुराई भी करते हैं. मैं जानता हूँ. किन्तु व्यापार में ये सब तो चलता ही है. सामने तो अधिकांश लोग मेरा सम्मान ही करते हैं!
वस्तुतः मैं धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति हूँ. नित नियमित पूजा-पाठ, मन्दिर जाना, दान-पुण्य, चन्दा देना, सभी धार्मिक अनुष्ठानों में नियमित भागीदारी, ये सब मेरे जीवन के अभिन्न अंग हैं.
पिछले सप्ताह एक चमत्कार हुआ. एक योगी बाबा के दर्शन हुए. अपनी आदत के अनुसार मैंने यथासंभव उनकी सेवा की. बाबा प्रसन्न हुए. बोले, "माँगो वत्स; क्या चाहते हो?"
मुझे लगा, मानो साक्षात ब्रह्म के दर्शन हो गये हों.
मांगने को बहुत कुछ था किन्तु मैं कुछ ऐसा मांगना चाहता था जिससे सभी कुछ मिल जाए.
मैंने बचपन में वह कहानी सुनी थी जिसमें एक व्यक्ति को एक सिद्ध पुरुष ने दो वरदान मांगने को कहा. वह व्यक्ति आलसी था और अपनी पत्नी से परेशान भी. उसने दो वर मांगे - एक, उसकी हथौड़ी अपने आप चलती जाए और दूसरे, जब तक वह चाहे, उसकी पत्नी कुर्सी से चिपकी रहे ताकि उसे परेशान न कर सके. ऐसे तुच्छ वरदान मांगकर उसने ऐसा स्वर्णिम अवसर व्यर्थ कर डाला.
मैं ऐसी बेवकूफ़ी नहीं करना चाहता था. अपनी समझ और ज्ञान का परिचय देते हुए मैंने निवेदन किया, "प्रभु! यदि आप मुझ तुच्छ प्राणी पर कृपा करना चाहते हैं तो मुझे सुख प्रदान करें."
"सुख से तुम्हारा क्या अभिप्राय है, वत्स. इम्पोर्टेड कार, एयरकण्डीशनर, कोठी - तुम किस वस्तु को सुख मानते हो? बोलो पुत्र, आज हम प्रसन्न हैं," योगीश्री मुस्कुराते हुए बोले.
मैं किसी वस्तु विशेष का नाम लेकर अपने वरदान को सीमित नहीं करना चाहता था. योगी थे, कि मुझसे स्पष्ट शब्दों में निवेदन करने को मुझे बाध्य कर रहे थे. मैंने तनिक विचार कर पुनः निवेदन किया, "प्रभु! मैं तुच्छ प्राणी क्या निवेदन करूँ? सुख का जो भी अर्थ आपकी दृष्टि में हो, मुझे वही प्रदान कर कृतार्थ करें."
योगी महाराज ने अर्थपूर्ण निगाहों से मुझे देखते हुए पूछा, "हमारी दृष्टि का सुख पाकर तुम प्रसन्न तो होगे बच्चा?"
"क्यों नहीं महाराज," मैं अपनी सफलता पर अभिभूत था. अन्ततः मैंने योगीश्री को मनचाहा वर देने के लिए राजी कर ही लिया था!
"तथास्तु," कहकर उन्होंने अपने कमण्डलु से पानी के छींटे मेरे मुँह पर दे मारे.
पलक झपकते ही मेरी काया-पलट हो गयी. मेरी वेशभूषा एक साधू के समान हो गयी. भगवा वस्त्र, हाथ में कमण्डलु, मस्तक पर तिलक, गले में मालाएँ. मैं अचम्भित, किंकर्त्तव्यविमूढ़ था.
"चलो बालक, तुम इस संसार से मुक्त हो. आज से तुम सन्यस्त हुए. अब तुम हमारे साथ हिमालय की कन्दराओं में तप के लिए प्रस्थान करो," योगी जी महाराज पूर्ववत मुस्कुराते हुए, किन्तु आदेशात्मक स्वर में बोले.
मेरा जैसे स्वप्न भंग हुआ. योगी के चेहरे की मुस्कान मुझे कुटिल लगने लगी. उनकी शक्ति का चमत्कार मैं देख चुका था, अभी-अभी भुगत चुका था. प्रतिवाद करना खतरे से खाली न था. इस विषम परिस्थिति में भी मैंने आत्मसंयम खोया नहीं. योगी के चरणों में मैं साष्टांग लेट गया और निवेदन किया, "भगवन! आप महान हैं. किन्तु मैं तो आपसे सुख मांग रहा था और आप मुझसे मेरा सब कुछ छीन ले रहे हैं! क्षमा याचना करता हूँ प्रभु, किन्तु मैंने ऐसा तो नहीं कहा था."
योगी अभी भी यथावत थे. मेरी आशंका के विपरीत वह क्रोधित न हुए. बोले, "बच्चा. हमारी दृष्टि का सुख तो यही है. इस नश्वर संसार को त्याग कर प्रभु की शरण में जाने वाले मार्ग से सुन्दर कोई मार्ग नहीं है और इस मार्ग पर चलने से बढ़कर कोई सुख नहीं!"
मेरी समझदारी ही मेरी दुश्मन बन गयी थी. मैं अपने ही चक्र में फंस गया था. इससे तो अच्छा होता मैं एक नया बंगला मांग लेता, अपनी पत्नी का स्वास्थ्य, बच्चों के लिए अच्छा व्यवसाय, या फिर और कुछ! यह मैं क्या मांग बैठा!
मैंने योगी के पाँव कसकर पकड़ लिये. आवाज़ में यथासंभव आदर-भाव लाकर मैंने पुनः निवेदन किया, "प्रभु! मैं यह वरदान पाकर धन्य हो गया. किन्तु मेरे हालात कुछ ऐसे हैं कि मैं अभी सन्यास नहीं ले सकता. बच्चे अभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हुए हुए; मेरा अपना व्यवसाय भी अभी कुछ विशेष जमा नहीं. ऐसे में मैं तो सन्यास लेकर निश्चित ही धन्य हो जाऊंगा किन्तु मेरे बीवी-बच्चों के साथ तो यह अन्याय हो जाएगा! क्षमा चाहूँगा भगवन, किन्तु मैं यह अन्याय कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाता हूँ."
मुझे भय था कि यह सुनकर योगी रुष्ट हो जाएंगे. वह मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले, "वत्स! मनुष्य की तर्क-पद्धति बहुत विचित्र है. वह किसी नियम के अनुसार नहीं चलती बल्कि अपने किंचित स्वार्थ एवं सुविधा से परिचालित होती है. मनुष्य स्वयं को कितना भी बुद्धिमान क्यों न माने, वह नहीं जानता कि उसका हित क्या है और शुभ क्या है. हम तुमसे तर्क-वितर्क करने नहीं आये. हमने तुम्हें एक वरदान मांगने को कहा और तुमने उसका प्रयोग कर लिया."
मुझे लगा जैसे उस योगी ने मुझे तान्त्रिक-शक्ति से कैद कर लिया हो. मन ही मन छटपटाते हुए मैंने विनम्रतापूर्वक रुंधे गले से कहा, "प्रभु! मैं, आपसे और वरदान नहीं मांग रहा. मैं तो मात्र इतना निवेदन कर रहा हूँ कि मुझे आप पूर्ववत सामान्य व्यक्ति बना दें. मुझे सन्यास लेने के लिए बाध्य न करें."
योगी महाराज के चेहरे के भाव पढ़ना कठिन था. वह बोले, "भक्ति का मार्ग मनुष्य को सुख देता है, उसे प्रतारणा नहीं. हम तुम्हारा मार्ग प्रशस्त तो कर सकते हैं, तुम्हें भक्ति नहीं दे सकते. भक्ति की कृपा तो स्वयं ईश्वर ही कर सकता है."
"परेशान न हो बच्चा. यह मार्ग तुम्हारे मांगने पर ही हमने तुम्हें दिया था. इसपर चलने के लिए तुम बाध्य नहीं हो," कहते हुए योगी ने पुनः जल के कुछ छींटे मुझ पर मारे. मैं पूर्ववत हो गया.
मैंने योगी के चेहरे को देखा. मुझे अब उस चेहरे पर व्याप्त मुस्कान कुटिल नहीं बल्कि भव्य और महान दीख रही थी. उनके मस्तक पर अपूर्व तेज था. इतनी सरलता से छुटकारा पाकर मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था. मुझे लगा, जैसे मैं उनके मस्तक के तेज को आत्मसात कर लूँ.
मैंने एक बार पुनः अपना सिर उन महान योगी के चरणों में रखकर निवेदन किया, "मुझसे भूल हो गयी भगवन! मुझे क्षमा करें. वस्तुतः मैं भक्तिमार्ग अपना सकूँ, इस योग्य नहीं हूँ, इसका ज्ञान तो आपने मुझे करा दिया. आपकी दृष्टि के सुख को मैं सुख नहीं मान सका क्योंकि मेरा हृदय अभी अपवित्र है. ईश्वर ने इसीलिए मुझे भक्ति का दान नहीं दिया. यह भी मैं समझ गया. किन्तु सुख की प्राप्ति के लिए क्या सन्यास लेना आवश्यक है?"
"कदापि नहीं पुत्र. एक सन्यस्त व्यक्ति का सुख सच्चे सन्यास में है. एक गृहस्थ के लिए सुख की परिभाषा यह नहीं," योगी महाराज ने स्पष्ट कहा.
"तो फिर ग्रृहस्थ का सुख क्या है? सुख देने वाली प्रायः सभी वस्तुओं का संग्रह और उपभोग मैं कर रहा हूँ. फिर भी मैं सुखी अनुभव क्यों नहीं करता," मैंने जिज्ञासा व्यक्त की.
"क्योंकि जिसे तुम सुख कह रहे हो, वह सुख है ही नहीं. ये सब तुम्हारी आकांक्षाएं मात्र हैं जिनका जन्म माया की चकाचौंध से हुआ है. इन आकांक्षाओं की पूर्ति की हवस में मनुष्य सुख का विचार ही नहीं करता.
अन्तर्मन में सच्चे सुख का अहसास होते हुए भी मनुष्य उसके प्रति आंखें मूंद लेता है - वह उसे निर्मूल प्रतीत होता है. सुख के पीछे मनुष्य की दौड़ सिर झुका कर दौड़ रहे सूअर की दौड़ के सदृश है. क्या यह दौड़ उसे वास्तविक सुख दे सकती है? ऐसा सुख तो मनुष्य के आत्मक्षय का कारण ही बन सकता है. इस सुख की अभिलाषा ही व्यक्ति को क्षोभ व असन्तोष देती है - और अन्ततः विक्षिप्तता!"
"तो क्या मनुष्य इच्छा करना छोड़ दे, कार्य करना ही छोड़ दे," मैंने बीच में टोका.
"इच्छा किसकी? बहुधा मनुष्य धन, सत्ता और शक्ति में सुख ढूँढता है. यह सुख नहीं, सुख का भ्रम है. इस सुख की प्राप्ति में व्यक्ति मदमस्त हो सकता है, सुखी नहीं. और यही सुख मनुष्य को अनवरत भय और पीड़ा भी देता है. भय, अपने संग्रहीत ’सुखों’ के खो जाने का, और पीड़ा इनके वास्तव में खो जाने पर; क्योंकि ये समस्त सुख नश्वर ही तो हैं," योगीश्री सीधे-सीधे सच बोलते जा रहे थे. ऐसा सच जिससे हम सब बचते-फिरते हैं.
"धन, शक्ति और सत्ता की नहीं तो फिर किन सुखों की इच्छा मनुष्य को करनी चाहिए," मैं स्वयं को रोक नहीं पाया, यह प्रश्न करने से.
"प्रत्येक मनुष्य जानता है कि सुख क्या है. आवश्यकता है उसे पहचानने की. एक रुग्ण व्यक्ति जानता है कि उसे हलका-फुलका आहार लेना चाहिए. फिर भी उसे चाट-पकौड़ी और पकवान ही आकृष्ट करें तो वह उनका सेवन स्वास्थ्य की कीमत चुका कर ही कर सकता है," योगीश्री ने स्पष्ट किया.
"फिर भी कृपा कुछ तो स्पष्ट करें कि सुख क्या है! मैं मूर्ख उससे कुछ दिशा-निर्देश ही ले लूँगा," मैंने आग्रह किया.
"सुख है प्रेम करना - सम्पूर्ण जगत से - बिना प्रतिदान की अभिलाषा के.
"मनुष्य का शरीर नश्वर है पुत्र. शाश्वत तो है केवल मनुष्य का विवेक, विश्वास और प्रेम. यह प्रेम उस निराकार ब्रह्म से भी हो सकता है और उसके द्वारा रची गयी इस सृष्टि से भी," योगी जी महाराज पूर्ववत मुस्कुरा रहे थे!
नज़दीक से
- विक्रम शर्मा
संत्री और मंत्री
मई का महीना समाप्त होने को था. दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से त्रस्त दिल्लीवासी किसी न किसी शीतल स्थल की तलाश में भटक रहे थे. अवसर पाकर हमने भी बाहर घूमने का कार्यक्रम बना लिया. दिल्ली के आसपास के पर्वतीय स्थल तो कई बार देखे हुए थे, इस बार मध्य-भारत के प्रसिद्ध पंचमढ़ी के वनों में घूमने का मन बनाया.
मध्य प्रदेश की सतपुरा पर्वत श्रृंखला में शहरों की भीड़ और प्रदूषण से दूर स्थित एक शांत और साफ़-सुथरा छोटा सा स्थान है पंचमढ़ी. समुद्र तल से 1100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित पंचमढ़ी अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य समेटे हुए है. पाँच पाण्डवों की गुफ़ाओं के कारण पंचमढ़ी कहलाने वाले इस पर्वतीय स्थल को गहरे सरोवर, झरने एवं विश्रांत घने वन एक अनुपम छटा प्रदान करते हैं. मनुष्यों द्वारा छेड़-छाड़ से मुक्त इसका प्राकृतिक सौन्दर्य इस स्थल के प्राकृतिक सौन्दर्य नैसर्गिक चट्टानों की आकृतियों और मन्दिरों की सम्पदा से सम्पन्न है. घाटियों, लाल रेतीली चट्टानों, टीलों और जल-प्रपातों के रूप में प्रकृति मानो निमन्त्रण दे रही हो!
पंचमढ़ी भोपाल से लगभग 200 कि. मी. दूर स्थित है. रमणीय पहाड़ी मार्ग से होते हुए लगभग चार से पाँच घण्टे का समय लगता है वहाँ पहुँचने में. जैसे-जैसे पँचमढ़ी निकट आता जाता है, दोनों ओर वनप्रान्त में से निकलते हुए सड़क पर वाहन में यात्रा करने का अपना अलग ही आनंद आता है.
पँचमढ़ी पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी. अगले दिन रविवार था. होटल के स्टाफ़ के साथ विचार-विमर्श कर अगले दिन इस सुन्दर स्थल के विहार का कार्यक्रम बना लिया. हमें बताया गया कि इन पहाड़ी मार्गों पर निजी वाहनों पर घूमना व्यावहारिक नहीं था क्योंकि कई मार्ग कच्चे थे और ऊबड़-खाबड़ थे. अतः हम स्टाफ़ को एक जिप्सी का प्रबन्ध करने के लिए कह दिया.
अगले दिन सुबह कार्यक्रमानुसार सुबह-सुबह हम तैयार हो गये. किन्तु जिप्सी नहीं आयी. पता चला कि भारतीय संसद में विपक्ष के नेता के पंचमढ़ी-भ्रमण के कारण सुरक्षा की दृष्टि से स्थानीय पोलीस ने अधिकांश जिप्सियों का अधिहरण कर लिया था. बाकी जिप्सियों के मालिकों ने अपनी जिप्सियाँ पोलीस के डर से छुपा दी थीं. कोई जिप्सी नहीं, मतलब कोई घूमना-फिरना नहीं. जहाँ-जहाँ साधारण टैक्सी जा सकती थी, वहाँ तो हम हो आये किन्तु मुख्य पर्यटक-स्थलों यथा जटाशंकर, पाण्डव गुफ़ाएं, अप्सरा विहार, महादेव गुफ़ा, रजत प्रपात, राजेन्द्र गिरि, चौरागढ़, धूपगढ़ आदि का भ्रमण हम नहीं कर पाये. होटल में ठहरे कुछ लोग तो कहीं भी नहीं गये - इस आशा में कि अगले दिन हालात बेहतर हो जाएंगे और वे जिप्सी में ही घूम लेंगे.
शाम को हम स्थानीय बाज़ार में घूम रहे थे. पैदल घूम-घूम कर जूते की शामत आ गयी थी. उसे ठीक कराने के लिए चर्मकार की सेवाएँ ले रहे थे. वहाँ तीन-चार चर्मकार एक साथ बैठे थे. उनमें से एक खाली बैठा था और ज़ोर-ज़ोर से स्वगत संभाषण दे रहा था: "ये मन्त्री (उसका तात्पर्य राजनैतिक नेताओं से था) खुद तो ए.सी. कारों में आएंगे, ए.सी. होटलों में ठहरेंगे, सब तरह की ऐश-मौज करेंगे. आम आदमी की दिक्कतों से इनका क्या लेना-देना! उनकी बला से! आम आदमी चाहे जिये, चाहे मरे. और ये सन्त्री (अर्थात नौकरशाह) तो और भी ज़्यादा बेदर्द हैं, मन्त्रियों से भी ज़्यादा. एक आदमी के कारण हज़ारों लोगों की रोटी छिन गयी है, बेवजह!"
हमारी ओर इशारा करते हुए वह बोला, "आप लोग हज़ारों मील दूर से आये हैं, पैसा खर्च करके. कुछ देखने आये हैं कि होटल के कमरे में कैद होने? बरबाद हो गया सब पैसा. वापस घर जाएंगे तो क्या बताएंगे, देख आये पंचमढ़ी? कौन भरपाई करेगा इस नुकसान की? कैसा लग रहा होगा आप लोगों को?
"ये अखबार टी.वी. वाले भी आये हैं मन्त्री जी के पीछे-पीछे! इण्टर्व्यू करते फिर रहे हैं लोगों का. ऊटपटांग सवाल पूछे जा रहे हैं, मौसम कैसा है.. कैसा लग रहा है.. अरे, कोई पूछ रहा है कितनी तकलीफ़ में हैं सब? कोई नहीं पूछता हमसे, शाम को क्या खिलाएंगे बच्चों को?
मैं हैरान था इस अभिभाषण से! इस प्रकटतः अनपढ़ व्यक्ति ने कितनी सुन्दरता से पूरी व्यवस्था पर टिप्पणी कर सार प्रस्तुत कर दिया था. नेताओं से लेकर नौकरशाह और मीडिया तक सीख सकते थे इस निर्धन आम आदमी से!
रात को होटल के डाइनिंग हॉल में होटल का स्टाफ़ भोपाल से नेता जी की सुरक्षा एवं अन्य व्यवस्था करने के लिए आये और होटल में ठहरे नौकरशाहों की आवभगत करने में व्यस्त था. हम जेब से पैसा खर्च करके ठहरे मेहमानों के साथ दोयम दर्ज़े के नागरिकों जैसा व्यवहार किया जा रहा था. मुझे रह-रह कर उस चर्मकार की बातें याद आ रही थीं!
अगले दिन, नेताजी का शहर में आगमन नियत था. हालात और भी खराब थे. कोई जिप्सी नहीं थी, पिछले दिन की तरह. आज तो निजी वाहनों को भी अनुमति नहीं थी पर्यटक स्थलों पर जाने की. नेताजी की सुरक्षा की खातिर! जो लोग रविवार को कमरे में ठहरे रहे, अब उनके पास दो दिन और कमरों में बन्द रहने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था.
मंगलवार प्रातः लौट के बुद्धू घर को आये. सोचा, फिर कभी दोबारा आएंगे पंचमढ़ी.
अगले सप्ताह बिटिया को मुम्बई के लिए विमान लेना था, दिल्ली एयरपोर्ट से. धौला कुआं के पास हमारा वाहन ट्रैफ़िक जाम में फंसा हुआ था. पता चला, प्रधानमन्त्री एयरपोर्ट जा रहे थे, जिसके कारण आम ट्रैफ़िक रोक दिया गया था. विलम्ब के कारण उड़ान छूट गयी, एयरपोर्ट पर अफ़रातफ़री में बिटिया का नया मोबाइल खो गया.
क्षोभ में एक पुराने समाचार-पत्र की सुर्खियों ने अचानक ध्यान आकृष्ट कर लिया, ’वी. आई. पी. की उड़ान के कारण तीन जैट विमान दुर्घटना से बचे.’ समाचार कुछ इस प्रकार था, "... वी.आई.पी. आवागमन के कारण आज जयपुर एयरपोर्ट के ऊपर तीन विमानों में ईंधन समाप्त हो गया और वे बाल-बाल बचे. इन तीन विमानों में उस समय 450 से अधिक यात्री सवार थे. आज कुल 11 उड़ानें जयपुर, चण्डीगढ़ एवं लखनऊ की तरफ़ मोड़ दी गयी थीं, जबकि 20 उड़ानें लगभग एक घण्टे तक दिल्ली एयरपोर्ट के ऊपर चक्कर लगाती रहने को मजबूर थीं. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की चीन-यात्रा एवं तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष गुर्बांगुली बेर्दिमुन्हा के आगरा भ्रमण के कारण एयरपोर्ट एक घण्टे से अधिक समय के लिए बन्द कर दिया गया था."
कुछ ही दिन बाद प्रधानमन्त्री की सुरक्षा के लिए किये गये बन्दोबस्त के कारण कानपुर में अमन खान नामक आठ वर्ष के एक बालक की मृत्यु का समाचार छपा.
कहते हैं, समय के साथ सभी घाव भर जाते हैं. पंचमढ़ी वाला अनुभव हो अथवा दिल्ली एयरपोर्ट वाला, हमारा कष्ट समय के साथ दूर हो ही जाएगा! किन्तु आठ वर्ष के उस नन्हे बालक के माता-पिता का दर्द क्या समय भी दूर कर पाएगा? किन्तु इन सन्त्रियों और मन्त्रियों को इससे क्या!
नज़दीक से
-विक्रम शर्मा
क्लब बुद्धिवादी
मैं हतप्रभ हूँ! मुझे क्लब बुद्धिवादी से निष्कासित किया जा रहा है. ये लोग मुझे निष्कासित करेंगे? ये आधे दिमाग वाले लोग स्वयं को बुद्धिवादी कहते हैं जिन्हें अपने हित की समझ तक नहीं?
बुद्धिवादी क्लब हमारी पैतृक परम्परा का अंग रहा है. मेरे दादाजी और दादी जी इस क्लब के आजीवन सदस्य थे. उस ज़माने में इस क्लब की सदस्यता कम ही लोगों के पास होती थी. महत्त्वाकांक्षाएं सीमित हुआ करती थीं. क्लब की सदस्यता की होड़ कम होती थी. क्लब की सदस्यता के लिए अपेक्षित था पढ़ा-लिखा होना, सामान्य ज्ञान और धर्म का ज्ञान होना. दादाजी तो बहुत पढ़े-लिखे थे, किन्तु दादी जी औपचारिक रूप से विशेष पढ़ी-लिखी नहीं थीं. फिर भी उन्हें इस क्लब की सदस्यता मिल गयी थी - अपने धार्मिक आचरण तथा धार्मिक पुस्तकें एवं मन्त्रादि कण्ठस्थ होने के आधार पर.
समय के साथ-साथ इस क्लब की सदस्यता की उपयोगिता बढ़ने लगी. सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए एक सहज सीढ़ी के रूप में इसका प्रयोग किया जाने लगा और इसकी सदस्यता के लिए होड़ लगने लगी. पारिवारिक परम्परा का निर्वहन करते हुए मेरे माता-पिता भी इस क्लब के आजीवन सदस्य रहे और उन्होंने मुझे 20 वर्षों की औपचारिक शिक्षा दिलायी जिससे मैं भी इस क्लब का एक सम्मानित सदस्य बन सकूं.
सतत परिवर्तनशील बुद्धिवादियों से स्वयं बुद्धिवाद भी नहीं बच सका. समय के साथ-साथ बुद्धिवाद की परिभाषा भी बदलती गयी. जो धर्म कभी बुद्धिवाद की पहली शर्त हुआ करता था, अब एक बड़ी अयोग्यता बन गया! पहले कभी बुद्धिवादी और पण्डित शब्द पर्यायवाची हुआ करते थे. अब तो पण्डित शब्द बुद्धिवादियों के लिए किसी गाली से कम नहीं!
उसी क्रम में आज बुद्धिवादी क्लब से मुझे निष्कासित करने की बात की जा रही थी.
लोग चीख-चीख कर कह रहे थे, "निकालो इस जाहिल को बाहर. इसे पहले भी कई बार चेतावनी दी जा चुकी है. यह वही है न जो एम. एफ़. हुसैन द्वारा बनायी गयी हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न पेण्टिंग्स पर आपत्ति कर रहा था? अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर उंगली उठाता है! वह भी दो कौड़ी के धर्म, परम्परा एवं आस्था के नाम पर! बाहर निकालो इस बेवकूफ़ को इस क्लब से!"
दूसरी तरफ़ से आवाज़ आयी, "और सार्वजनिक स्थलों पर मर्यादा में रहने की बात भी तो यही कर रहा था! वैयक्तिक स्वतन्त्रता पर पहरा लगाने वाले इस गँवार को भीतर आने किसने दिया? वैयक्तिक स्वतन्त्रता पर किसी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता."
मैंने प्रतिरोध किया, "वैयक्तिक स्वतन्त्रता का अर्थ समझते हैं आप? वैयक्तिक स्वतन्त्रता के नाम पर यदि मैं आपको गाली दूँ तो क्या आपको स्वीकार्य होगा?"
"अवश्य स्वीकार्य होगा. उसके बाद हम तुझे पीटने के लिए भी तो स्वतन्त्र हैं," उसी कोने से ठहाका गूँजा.
"यह तो एकदम जाहिल व्यक्ति है. उस दिन यह मुक्त यौन सम्बन्धों को व्यभिचार कह रहा था," फ़्रैंच-कट दाढ़ी वाले बुद्धिवादी ने बहुत सोच-समझ कर कहा. "और विवाह किए बिना लिव-इन सम्बन्धों पर भी को भी अनुचित कह रहा था यह," लम्बे बालों को चुटिया में बांधते हुए हुए एक प्रौढ़ बुद्धिवादी ने जड़ा.
क्लब में मेरे कुछ मित्र भी थे. मैंने समर्थन की अपेक्षा से उनकी ओर देखा. वे असहाय दिख रहे थे. बहुमत में बहुत शक्ति होती है. बहुमत चाहे बुद्धिवादियों का हो अथवा अनपढ़ लोगों का, उसका चरित्र एक-सा होता है - बेपरवाह और गैर-जिम्मेदाराना.
मुझे अकेला पाकर समवेत स्वर में पुकार होने लगी, "इस दकियानूसी को बाहर निकालो. हमें परिवर्तन चाहिए. बुद्धिवादी क्लब परिवर्तन के लिए है. सब बदल डालो. सब परम्पराओं को मिटा डालो. जो परिवर्तन नहीं चाहता उसे दकियानूसी क्लब में डाल दो. बाहर करो इसे."
"यदि यही बुद्धिवाद की परिभाषा है, तो मुझे स्वयं नहीं रहना बुद्धिवादी. किन्तु भगवान के लिए मुझे दकियानूसी तो न कहो." भारी मन से यह कहकर बाहर निकलने के लिए मैंने दरवाज़ा खोला. दरवाज़ा सीधे दकियानूसी क्लब में खुलता था. मैंने घबराकर दरवाज़ा बंद किया और वापस आ गया. बुद्धिवादी ठहाका मारकर मेरा उपहास उड़ा रहे थे. मैंने भागकर दूसरा दरवाज़ा खोला. वह भी दकियानूसी क्लब में ही खुलता था. एक-एक कर मैंने सारे दरवाज़े खोल कर देख लिए. सब दकियानूसी क्लब में ही खुलते थे.
मैं थकावट से हाँफ़ रहा था. एक परिपक्व से दिखने वाले बुद्धिवादी कह रहे थे, "दो ही रास्ते हैं तुम्हारे पास. या तो दकियानूसी कहलाने को तैयार हो जाओ, वरना जैसा हम कहें, वैसा ही तुम भी कहो!"
अब मुझे समझ आ रहा था कि क्यों मेरे मित्र इतने असहाय थे; मुझसे सहमत होते हुए भी मुझे समर्थन देने में असमर्थ क्यों थे.
नज़दीक से
-विक्रम शर्मा

