Monday, March 5, 2018

गुंडे-मवाली


एक दिन मैं अपनी गली की एक दूकान पर खड़ा कुछ सामान ले रहा था. एक युवक वहाँ आकर रुका. बिखरे बाल. सीने के बटन खुले हुए. गुंडे-मवालियों जैसा अंदाज़. वह एक अन्य युवक को धमका रहा था. अचानक उसकी नज़रें मुझसे मिलीं. वह कुछ अचकचा-सा गया और अपनी बात को संक्षेप में समाप्त कर दूसरे युवक को गाली देकर चला गया. मुझे उसका चेहरा परिचित सा लगा किन्तु स्मरण नहीं आया कि वह कौन था और मुझे देखकर असहज क्यों हो गया था.

उस घटना के बाद वह युवक मुझे अकसर गली में दिखने लगा. खुले बटन. लोफरों वाला अंदाज़. पास से गुज़रता तो पता नहीं क्यों दिल करता कि मैं उसे रोक कर उससे बात करूं. उसे कुछ सलाह दूं. किन्तु वह युवक मेरे प्रति उदासीन, सीना फुलाए कमीज़ के कालर उठाये, पास से गुज़र जाता. 

एक दिन रात को सोने से पहले मैं उसके बारे में सोच रहा था. यकायक मुझे उस युवक का स्मरण हो आया. यह तो वही युवक था, जो मुझे जब भी मिलता, बहुत सम्मान के साथ मुझे नमस्कार किया करता था. कारण? एक बार कुछ दिनों तक परीक्षा के दिनों में मैंने गली के कुछ युवा छात्रों की पढ़ने में सहायता की थी. उन युवाओं में एक वह भी था.

पढ़ाई के दौरान वह अधिक उत्साह नहीं दिखाता था. चुपचाप बैठा रहता था. संभवतः वह अपने परिणाम को लेकर अधिक आशावान नहीं था. समयाभाव के कारण मैं भी उसकी पढ़ाई में अलग से कोई रूचि नहीं ले पाया था. पता नहीं, वह पास भी हुआ था कि नहीं, मुझे इसकी जानकारी भी नहीं मिली. बस उसका और मेरा इतना ही सम्बन्ध था कि वह मुझे सम्मान के साथ नमस्ते करता और मैं मुस्कुरा कर उसे उत्तर देता. वर्षों बीत गए. वह युवक अब दिखाई नहीं देता था. मैं भी उसे भूल चुका था. 

जो हमेशा झुक कर सम्मानपूर्वक अभिवादन किया करता था, उसमें इतना बदलाव! चेहरा वही, फिर भी इतना अलग व्यक्तित्त्व! अब मुझे समझ आया कि क्यों वह चेहरा मुझे इतना आकृष्ट करता था; क्यों मैं उसके बारे में इतना सोचता था.

अगली बार जब मुझे वह दिखा तो मैंने उसे बुला लिया. उसके लिए यह अप्रत्याशित था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मुझसे कैसे व्यवहार करे. उसकी छवि एक गुंडे-मवाली की थी किन्तु मुझसे बात करते समय उसे अपना पुराना स्वरूप स्मरण हो रहा था और वह इस ऊहापोह से निकल नहीं पा रहा था. मेरे बुलाने पर उसने मुझे अभिवादन तो किया किन्तु उसमें पहले जैसा सम्मान नहीं था. अकड़ थी. 

थोड़ी बातचीत के बाद वह संयत हुआ. मैंने उसे अपने घर चलने को कहा. मेरे इस प्रस्ताव पर पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं उस गुंडे को अपने घर चलने के लिए कह रहा था. 

घर पहुँचने पर मेरे सामने वही वर्षों पहले वाला नवयुवक बैठा था. राकेश नाम था उसका. मासूम. झुकी हुई आँखों में नमी. दो-चार मिनटों की बातचीत के बाद वह रो रहा था – बच्चों की तरह. आज कहूं तो उसकी कहानी एक घिसी-पिटी फ़िल्मी कहानी की भाँति थी. किन्तु मैं स्वयं उसकी कहानी का साक्ष्य था. बस इतना नहीं, मैं जानता था कि वह नवयुवक भी उस कहानी का एक प्रमुख पात्र था.

हमारी गली का वातावरण बहुत तनावपूर्ण था उस दिन. पूरी गली वर्दीधारी पुलिस वालों से भरी हुई थी. सुनने में आया, कुछ गुंडे फ़ौजदारी करके छुपे हुए थे किसी घर में. सब लोग अपने-अपने घरों में सहमे हुए दुबके थे. घर-घर की तलाशी ले रही थी पुलिस. खबरों-अफ़वाहों का बाज़ार गरम था. बैंक डकैती से लेकर एक बड़े नेता की ह्त्या तक की अफ़वाहें थीं. किसी छोटी-मोटी वारदात से तो पुलिस हरकत में आती नहीं.

एक खबर जिसकी बाद में पुष्टि भी हुई, यह थी कि युवकों के दो गुटों में झगड़ा हो गया था. बात बिगड़ गयी और एक युवक का सर फूट गया. संयोग से जिस युवक का सर फूटा था, वह एक पुलिस अधिकारी का पुत्र था. अब पुलिस दूसरे गुट के एक-एक युवक को चुन-चुन कर पकड़ रही थी, उन्हें प्रताड़ित कर रही थी.

थोड़ी देर में खबर आयी कि गली के एक घर में कुछ युवक सचमुच छुपे हुए थे और पकड़े गये थे. उन युवकों में एक राकेश भी था, इसकी जानकारी मुझे नहीं थी.

“पुलिस ने हमें बहुत पीटा, थाने में. तब तक, जब तक हम उनके लगाए सभी आरोपों को मान नहीं गये – चाहे वे सच्चे थे अथवा मनगढ़ंत. हम पर पैसे लूटने, चोरी करने और चाकू से हमला करने जैसे आरोप लगाये गये. हमने उस लड़के को मारा ज़रूर था, किन्तु मारा तो उन्होंने भी था हमें. हममें से एक लड़के ने, जो बहुत पिट रहा था, पत्थर उठाकर दे मारा एक लड़के के सर, और उसके सर से खून निकलने लगा. चाकू को तो हमने कभी हाथ भी नहीं लगाया था, सिवाय सब्ज़ी काटने वाले चाकू के,” राकेश रोते-रोते बता रहा था अपनी आपबीती.

“अदालत में खून लगा चाकू भी था और अनेक गवाह भी. हमें सज़ा हो गयी – उस अपराध के लिए, जो हमने नहीं किया था.

“जेल में हमें कई तरह के लोग मिले. गुंडे-मवालियों से लेकर वर्दी-वाले गुंडे. सबने वहां हमसे दुर्व्यवहार किया.

“जेल से बाहर आकर हम सामान्य जीवन जी सकें, इसका सवाल ही नहीं है. कोई हमसे सीधे-मुँह बात ही नहीं करता. घर में भी नहीं. घर में तो सब मुझे गुंडा-मवाली कहते हैं. कॉलेज जाने की आयु रही नहीं. काम कोई देता नहीं. सिर्फ़ गुन्डागर्दी की ट्रेनिंग है हमें. तो गुंडा-मवाली बनने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं रहा,” शून्य में ताकता हुआ बोल रहा था वह.   

राकेश कसम खा कर कह रहा था कि जिन अपराधों की सज़ा उसे मिली थी और जेल से बाहर आकर भी मिल रही थी, उनमें से कोई भी अपराध उसने नहीं किया था. मुझे उसकी आँखों में सच्चाई दिख रही थी. मुझसे झूठ बोलने का कोई कारण भी नहीं था.

अब मेरी नज़रें झुकी हुई थीं. साहस नहीं हो रहा था उसकी ओर देखने का. कौन था ज़िम्मेदार उसकी इस त्रासदी का? वह स्वयं, जो पढ़ाई के स्थान पर आवारागर्दी करता था? पुलिस वाले, जिन्होंने उसे अपराधी बनाया? उसके परिवारवाले, जिन्होंने उसे आवारागर्द बनने दिया? शिक्षा-व्यवस्था? या समाज जो अपराधी का ठप्पा लगे व्यक्ति से या तो डरता है या नफ़रत करता है. उसे अपनाता नहीं.


Wednesday, February 28, 2018

मानवाधिकार


किशोरावस्था थी उस समय मेरी. घर के बगल वाले खाली प्लाट पर खेल रहे थे हम. शाम होने वाली थी. अचानक गली में से एक साइकिल रिक्शा बहुत तेज़ गति से निकली. तेज़ शोर के साथ उसके पीछे तीन-चार रिक्शा और निकलीं, उतनी ही तेज़ गति से. हम सकपका कर गली में आये. रिक्शाएं जा चुकी थीं. गली में कई लोग ऐसे ही मुँह बाए खड़े थे. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

इतने में किसी बच्चे की माँ वहां आयी और अपने बच्चे को पकड़ कर ले चली. अन्य बच्चों को भी हिदायत दी कि सब बच्चे अपने-अपने घर चले जाएँ, तुरन्त. पुलिस कुछ गुंडों का पीछा कर रही थी. बाहर रहना खतरे से खाली नहीं था.

हम भागकर अपनी छत पर चढ़ गये. इतने में वही साइकिल रिक्शा फिर दिखाई दी. पहली रिक्शा में दो कसे बदन के दो युवा बैठे हुए हंस रहे थे और पीछे एक के बाद एक चार रिक्शाओं में दो-दो पुलिस के जवान लाठियां लिए बैठे थे.

इन रिक्शाओं ने गली के तीन-चार चक्कर लगाए, थोड़ी-थोड़ी देर के बाद. लगता था पूरे मोहल्ले के चक्कर लगा रही थीं ये रिक्शाएं. अत्यंत उत्तेजक एवं लोमहर्षक दृश्य था. देखते ही देखते सांझ का झुटपुटा हो गया. हम इन्तज़ार कर रहे थे, रिक्शाओं के एक और चक्कर का, परन्तु खेल अब समाप्त हो गया था.

इसके आगे की कहानी किसी साथी ने अगली सुबह बतायी. पुलिस को पूरे मोहल्ले के कई चक्कर लगवाने के बाद सांझ होने पर गुंडे भागकर खेतों में घुस गये. पीछे-पीछे पुलिस भी चली गयी, अति-उत्साह में. वहां गुंडों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. लाठीधारी पुलिस वाले जान बचाकर भागे घने खेतों की ओर, और वहां दुबक कर छुप गये. गुंडे अट्टहास करते हुए वहां से चले गये और पुलिस वाले जान बचाकर वहीं दुबके रहे खड़ी फसल में. देर रात थाने से पुलिस का एक और दस्ता आया टॉर्चों के साथ, और ढूंढ-ढूंढ कर अपने साथियों को निकाल कर साथ ले गया.

बहुत थू-थू हुई पुलिस की हर तरफ़. चले थे गुंडों को पकड़ने! कायरों की तरह अंधेरी झाड़ियों में दुबके रहे डरकर! और भी बहुत कुछ. जैसे, पुलिस वाले तो गुंडों से मिले हुए होते हैं। यह पीछा-वीछा तो सब दिखावटी है! डंडे लेकर चले थे पिस्तौल-धारी गुंडों को पकड़ने? क्या इन्हें मालूम नहीं था कि गुंडों के पास कौन से हथियार थे? पुलिस वाले होते ही डरपोक हैं. घूस खा-खाकर मानसिक रूप से और हरामखोरी करके शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं. इन पुलिस वालों का बस तो सिर्फ़ शरीफ़ लोगों पर चलता है, गुंडे-मवालियों से तो डरते हैं ये! जितने मुँह, उतनी बातें.

इस घटना के कुछ दिनों बाद हम मकान बदल कर दूसरे मोहल्ले में चले गये. बालक-मन भूल गया उस वारदात को.

कई वर्षों बाद उसी इलाके में जाना हुआ. बचपन के दोस्तों की एक मंडली में हम घूम रहे थे यूं ही. एक दोस्त ने पूछा, “चाय पी जाए?” सबने हामी भरी. “चलो थाने चलते हैं चाय पीने.” मुझे कुछ अजीब लगा, थाने में चाय? मित्र ने बताया, “यार, रज्जो की चाय बहुत बढ़िया होती है, यहीं थाने के गेट पर दूकान है उसकी.”

नाम सुना-सुना सा लग रहा था. दुकानदार को देखकर बहुत तरस आ रहा था. पूरा शरीर मानो मुड़ा-तुड़ा हो. लगता था जैसे चाय अब छूटी उसके हाथ से. परन्तु धीरे-धीरे ही सही, वह चायवाला रज्जो अदरक, इलायची कूट कर बड़े सलीके से चाय बना रहा था. चाय वाकई बहुत स्वादिष्ट थी.

रज्जो को देखकर श्रद्धा-सी उमड़ रही थी. उसकी स्वावलंबन की भावना अतुल्य थी. ऐसे शरीर के साथ भी कोई काम कर सकता है, हृदय रुदन कर रहा था.

वहां से चलने पर बातचीत का विषय था रज्जो. “भगवान् भी कैसे-कैसे अत्याचार करता है बेबस लोगों पर,” मैं अनायास कह गया.

“मालूम है कौन है रज्जो?” बचपन में मेरे साथ उस खाली प्लाट में खेलने वाले उस मित्र ने पूछा. मुझे कैसे मालूम होता! “याद है, बचपन में एक दिन एक गुंडे ने पुलिस को खूब चक्कर खिलाये थे मोहल्ले के, और खेतों में ले जाकर गोलियां चलाकर भगा दिया था पुलिस वालों को? फिर आधी रात को पुलिस वालों ने ढूंढा था अपने साथियों को?” एक चलचित्र की भांति पूरा घटनाक्रम मेरी आँखों के सामने से गुज़र गया.

“यह रज्जो ही था वह गुंडा.”

“फिर यह सब कैसे?” मैंने पूछा.

“उस वारदात के बाद कई मुठभेड़ें हुईं पुलिस और रज्जो के गिरोह के बीच में. हर बार रज्जो हावी रहा पुलिस पर और पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पायी रज्जो को. बाद में तो रज्जो का गिरोह बहुत बड़ा और ताकतवर हो गया था. कई बार पुलिस वाले पिटे भी गुंडों से.

“आखिरकार पुलिस का भी दिन आया. पुलिस और रज्जो गिरोह के बीच बहुत लम्बी चली वह मुठभेड़. इस बार पुलिस फ़ोर्स अधिक थी. खूब तोड़ा पुलिस ने पूरे गिरोह को. उसी मुठभेड़ में रज्जो के शरीर की हड्डियों के कई टुकड़े हो गये. किसी लायक नहीं रहा रज्जो. हाथ-पैर सब बेकार हो गये.

“मानवाधिकार आयोग से पुलिस को नोटिस वगैरह भी आये थे; जांच भी हुई थी; परन्तु रज्जो ने पुलिस के पक्ष में बयान दिया था, अपने अपराध और पुलिस पर आक्रमण की बात स्वीकार कर."

"मानवाधिकार वाले रज्जो की ज़िंदगी तो नहीं सुधार सकते थे न.”

“जिन पुलिस वालों ने उसका यह हाल किया था, उन्होंने ही इसे यहाँ थाने के गेट पर जगह दे दी, चाय की छोटी सी दूकान लगाने के लिए - तरस खाकर. तब से रज्जो शराफ़त और मेहनत से काम करता है, पुलिस वालों और बाहर से आने वालों को चाय पिलाता है और अच्छी चाय के लिए मशहूर है. आने वाले अपराधियों को अपना टूटा हुआ शरीर दिखा कर सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है.”

मैं पीछे मुड़कर देख रहा था. रज्जो की दुकान तो ओझल हो गयी थी नज़रों से, किन्तु साइकिल-रिक्शा पर बैठा घमंड से हंसता हुआ वह रज्जो दिख रहा था मुझे.

नज़दीक से
- विक्रम शर्मा


Saturday, February 24, 2018

जेबकतरे

मुम्बई में मेरी पोस्टिंग तो बहुत कम समय के लिए हुई थी परन्तु वह शहर कम समय में ही बहुत कुछ सिखा जाता है.

वर्षों पुरानी बात है. तीन महीने के लिए ट्रेनिंग के लिए मुम्बई में मेरी पोस्टिंग हुई थी एक बैंक की मुम्बई फ़ोर्ट की एक शाखा में. फ़ोर्ट-क्षेत्र में ही मेरे बैच के कुछ अन्य साथी भी कार्यरत थे, विभिन्न शाखाओं में. लगभग रोज़ शाम को हम चौपाटी पर इकट्ठे होते और मरीन ड्राइव अथवा आसपास कुछ समय बिता कर अपने-अपने स्थानीय निवास की ओर रवाना हो जाते.

मैं कांदीवली में ठहरा हुआ था. मेरे साथी मेरे साथ ही चर्चगेट से लोकल पकड़ा करते और रास्ते में अपने-अपने गंतव्य पर उतरते जाते. कांदीवली स्टेशन सबसे बाद में आता, जहां मैं उतरा करता था.

उस शाम मेरे सभी साथी बान्द्रा स्टेशन पर ही उतर गये थे – देर रात का कोई कार्यक्रम बनाकर. मैंने वहां उतरने के स्थान पर सीधे घर जाना ठीक समझा था.

बान्द्रा स्टेशन पर उनके उतरने के बाद जैसे ही ट्रेन चली, कम्पार्टमेंट के दरवाज़े से कुछ आवाजें आने लगीं. कोई झगड़ा हो रहा था शायद. मैं भीतर बैठा था कम्पार्टमेंट के बीचोबीच. देर शाम को दफ़्तर से चलो तो दादर, बान्द्रा आते-आते सीट मिल जाया करती थी उन दिनों. ट्रेन आगे बढ़ती रही, कम्पार्टमेंट खाली होता रहा और आवाजें बढ़ती गयीं. “कोई जेबकतरा पकड़ा गया है. लोग धुनाई कर रहे हैं,’ यात्रियों में से किसी ने खबर दी.

मुम्बई लोकल के दैनिक-यात्री किसी से मन से नफ़रत करते हैं तो वह हैं मुम्बई के जेबकतरे.

एक बार बैंक की शाखा में दोपहर के भोजन के समय बातचीत ने मुम्बई के जेबकतरों की समस्या का रुख कर लिया.

एक सज्जन बता रहे थे कि किस प्रकार विरार से चर्चगेट के बीच चलने वाली डबल फ़ास्ट ट्रेन में एक बार एक जेबकतरा पकड़ा गया. लोगों ने उसे घंटा भर जी भरकर पीटा. इतना पीटा कि उसके कपड़े फट गये. और अंत में उसे चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया.

“च्च्च...” मेरे मुँह से अनायास निकला. “इतने निर्दयी लोग,” मैं सोच रहा था.

मेरी यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया मुम्बई के निवासी कर्मचारियों को रास नहीं आयी, यह उनके चेहरों से स्पष्ट था. मेरे लिए हैरानी की बात यह थी कि मेरी इस प्रतिकृया पर सबसे अधिक आपत्ति की एक महिला कर्मचारी ने. वह भी आवेशपूर्वक, “क्या च्च्च... और कैसा बरताव होना चाहिए इन जानवरों के साथ? एक भला आदमी पूरे महीने काम करता है, अपने बीवी-बच्चों के लिए, परिवार के लिए, उनकी छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी करने के लिए! और यह जेबकतरा आकर उसकी पूरे महीने की महीने की कमाई पल भर में उड़ाकर ले जाता है! यह ठीक है? उस कमाई के घर न आने से उसके निर्दोष और बीमार माता-पिता का इलाज नहीं हो पाता और वे मर जाते हैं, वह ठीक है?”

मुझे काटो तो खून नहीं. इतने आवेश में उन महिला को देखकर मैं सकपका गया था. उत्तर ढूँढने और देने का प्रश्न ही नहीं था.

मैं समझ गया कि आज भी ऐसा ही कुछ होने वाला था, मेरे ही कम्पार्टमेंट में. “पता नहीं, ये कुंठित भीड़ इस जेबकतरे को ज़िंदा छोड़ेगी या फिर चलती ट्रेन से फेंक देगी...,” मैं सोच रहा था.

अपने कार्यालय के उस महिला के उत्तेजित रुख को झेलने के बाद मैं इस भीड़ की मानसिकता और जेबकतरों नामक राक्षसी वृत्ति के लोगों के बारे में सोचता रहता, लोगों से बात करता रहता.

लोग प्रायः जेबकतरों को दण्डित करने के पक्षधर ही मिले. पुलिस को सौंपने से क्या होगा? सब मिले हुए होते हैं, ऐसा ही विचार था अधिकांश लोगों का.

एक बार मुझे जेबकतरों द्वारा की जा रही तबाही का निजी अनुभव भी हो ही गया. दोपहर के वक्त मैं सफ़र कर रहा था लोकल ट्रेन में. भीड़ सामान्य से काफी कम थी. जब मैं ट्रेन से उतरा तो पता चला कि मेरी तीन जेबों पर एक-साथ आक्रमण हुआ था. नुकसान तो अधिक नहीं हुआ, किन्तु मेरी परेशानी यह थी कि मेरी तीन जेबों पर एक साथ आक्रमण हुआ और मुझे पता भी नहीं चला. अर्थात जेबकतरा एक नहीं था, कम से कम तीन तो थे.

एक दूसरा पहलू भी मिला मुझे, लोगों के साथ इस बारे में बात करते-करते. कुछ लोगों ने बताया कि जेबकतरे दो-तीन नहीं, भीड़ के रूप में चलते हैं. जिसका मौक़ा लग जाए, वह जेब काट लेता है, पकड़े जाने पर उसके अन्य साथी आम-जनता का जामा पहनकर ‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगते हैं और अपने शिकार को ही पीटने लगते हैं. अन्य यात्री उस शिकार को ही जेबकतरा समझकर उसपर अपनी कुंठा से मुक्त होने का उपक्रम करने लगते हैं. इस कोलाहल में जेबकतरे वहां से फ़रार हो जाते हैं और वह आम आदमी अन्य आम आदमियों से पिटता रहता है.

भीड़ की आवाजें मेरी ओर बढ़ रही थीं, चीत्कार के साथ. देखते ही देखते भीड़ वहीं आ पहुँची जहां मैं बैठा था. एक सरदार जी, बिना पगड़ी के, बिखरे-बेतरतीब लम्बे बाल, सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, जगह-जगह से फटा हुआ और और मुसड़ा हुआ. चेहरे पर खरोंचों के निशान. क्रोध से भरी भाव-भंगिमा. एक हाथ में एक लंबा सा पेचकस और उनकी खुली हुई पगड़ी. दूसरे हाथ से एक आदमी के गिरेबान को पकड़े हुए और उसे घसीटते हुए.

मेरी बगलवाली सीट खाली थी. उन्होंने वह पगड़ी मेरी गोद में रखी और धम्म से उस खाली सीट पर बैठ गये. वह व्यक्ति भी घिसटता हुआ सामने ज़मीन पर आ पड़ा. सरदार जी ने पेचकस को सीधे हाथ में ज़ोर से पकड़ा और लगे उसे उस व्यक्ति के पेट में घुसाने. पूरी भीड़ ने ज़ोर से चीत्कार किया, “छोड़ दो सरदारजी, जाने दो,” की गुहार लगाने लगी.

ऐसा बार-बार होता. सरदार जी पेचकस को हथियार बनाकर उस व्यक्ति के पेट में घुसाने लगते और भीड़ चीत्कार कर उठती.

वह व्यक्ति जो सरदार जी की गिरफ़्त में था, रो-रोकर कहता, “आप मेरा आई.डी. कार्ड देख लें, मैं एक नौकरीपेशा शरीफ़ आदमी हूँ. मैंने कुछ नहीं किया.”

मैंने पंजाबी भाषा में बात की सरदार जी से. उन्होंने मुझे पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया. बताया कि वह भारी नकदी लेकर कहीं जा रहे थे, कुरते की जेब में रखकर. एक जेबकतरे ने उनकी जेब में हाथ डाला तो उन्होंने पकड़ लिया. इतने में जेबकतरे के साथियों ने वही फ़ॉर्मूला लगाया और लगे पीटने सरदारजी को. थोड़ी देर बाद वे जेबकतरे तो कंपार्ट्मेंट की भीड़ में गुम हो गये और सरदारजी पिटते रहे आम आदमियों से.

“मैंने एक हाथ से अपने कुरते की जेब को पकड़ रखा था. वरना क्या मजाल इन गीदड़ों की, मुझपर हाथ उठा पाता कोई”, सरदार जी कह रहे थे, “हो सकता है यह गरीब जिसे मैंने पकड़ रखा है, बेक़सूर हो. मगर किसी ने तो मारा है मुझे. मेरी यह गत अपने आप तो बन नहीं गयी. इस भीड़ में अगर कोई मर्द हो, जो यह माने कि उसने मुझपर हाथ उठाया था, तो कसम वाहेगुरू की, मैं इस आदमी को छोड़ दूंगा और यह पेचकस उस मर्द के पेट में घुसा दूंगा. यह पेचकस मैं घर से ही लेकर निकला था ऐसे किसी वाकये के लिए. जल्दी थी, इसलिए मैं लोकल ट्रेन में आया वरना मैं टैक्सी से आता॰"

पेचकस और चीख़ों का यह खेल सान्ताक्रूज़ स्टेशन तक जारी रहा. तब तक सरदारजी ने पगड़ी बाँध ली थी, चेहरा साफ़ कर लिया था. सान्ताक्रूज़ स्टेशन पर उन्हें उतरना था.

उतरते वक्त उन्होंने उस व्यक्ति को अपनी गिरफ़्त से मुक्त किया और भीड़ को हिदायत दी, “आज के बाद कभी किसी को यूं ही जेबकतरा न समझ लेना. खुद देखो किसी को जेब काटते हुए, तभी यकीन करना.”

नज़दीक से
-       - विक्रम शर्मा



Tuesday, February 20, 2018

भजिया-पकौड़े वाला

गरम नींबू-पानी के कटोरे में हाथ धोकर गीले सुगंधित तौलिये से हाथ मुंह पोंछते हुए देवेश ने कहा, “भोजन सचमुच बहुत स्वादिष्ट था।“ सुनकर मुझे ऐसे प्रसन्नता हुई जैसे यह भोजन मैंने स्वयं बनाया हो।

मैं मुंबई में एक बैंक में कार्यरत था और मेरा छोटा भाई देवेश मुझसे मिलने मेरे पास आया हुआ था। कहने को कैरियर की दृष्टि से मैं एक सफल व्यक्ति था। लाखों-करोड़ों युवाओं का स्वप्न था बैंक में पी॰ओ॰ की नौकरी पाना। मेरा भी यह स्वप्न था और मैं इस स्वप्न को साकार कर चुका था। मेरे परिवार को गर्व था मेरी इस उपलब्धि पर। मेरा छोटा भाई भी मुझसे बहुत प्रभावित था और मेरी ही तरह एक पी॰ओ॰ बनाना चाहता था। मैं खुश था कि मेरा भाई मेरे पास रहने आया था। मैं चाहता था कि वह नज़दीक से देखे मेरा जीवन और उसके बाद अपने भविष्य के बारे में निर्णय ले।

मेरी नियुक्ति मुंबई फोर्ट क्षेत्र की एक शाखा में हुई थी। शुरू के दिनों में होटल में रुका जो बहुत महंगा था। फिर एक लॉज में ठहरा। कुछ दिनों बाद लॉज भी जेब को कचोटने लगी। एक चॉल में भी रुका, परंतु वहाँ एक दिन से अधिक ठहरा नहीं गया। चर्च गेट से विरार तक और वी॰टी॰ से लेकर ठाणे तक सभी क्षेत्रों में विकल्प तलाश मारे परंतु कहीं बात नहीं बनी।

एक सहकर्मी थे मेरे, मुझसे वरिष्ठ थे। हर रोज़ मुझसे आशियाना ढूँढने की कथा सुना करते। कांदीवली में रहते थे, अपने भाई के साथ। जैसे मेरे पास अनेक किस्से थे छत ढूँढने के, उसी प्रकार उनके पास अपने भाई की बेरोजगारी के अनेक किस्से थे। पता नहीं, उन्हें मेरी दुर्दशा पर तरस आया या फिर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने का अवसर दिखा, एक दिन उन्होंने मुझे प्रस्ताव दिया उनके फ्लैट में उनके साथ रहने का। उसी रोज़ मैं उनके साथ उनके घर गया। दो छोटे कमरों का एक फ्लैट था। दो कमरों के बीच में जगह बनाकर एक छोटी रसोई और एक स्नानघर की व्यवस्था की गयी थी। दोनों भाई एक-एक कमरे में रहते थे।

“भीतर के कमरे में डबल बेड है। हम दोनों भाई वहीं सो सकते हैं। जब कभी घर से कोई आता है, तब हम ऐसा ही करते हैं। अब तो कोई आता भी नहीं यहाँ रहने। बाहर के कमरे में दीवान है, उसमें तुम रह सकते हो,” उन्होंने योजना समझाई, “रसोई में हम सिर्फ चाय बनाते हैं, दूध गरम करते हैं। खाना हम बाहर ही खाते हैं। दफ्तर में डिब्बा आता है और शाम को हम यहाँ एक आंटी के घर में खाकर आते हैं। तुम भी ऐसा ही कुछ कर सकते हो। अब तक भी तो यही कर रहे हो। तुमसे जो किराया मिलेगा उससे भाई का जेब खर्च निकल जाएगा।“ योजना उत्तम थी, यही तो मैं चाहता था।

तब से मैं वहीं कांदीवली में ही रह रहा था। बहुत सुविधाजनक नहीं था, परंतु उससे बेहतर कोई उपाय था भी नहीं। एक रोज़ मेरे वरिष्ठ सहयोगी के पिताजी आए, तो वे दो दिन उनके छोटे भाई ने मेरे कमरे में दीवान के साथ ज़मीन पर बिछौना लगाकर बिताए। एक छोटी मेज़ थी जिसे ज़मीन पर बिछौना बिछाने की जगह बनाने के लिए दीवार के साथ चिपका दिया जाता और दो फोल्डिंग कुरसियों को भीतर वाले कमरे में ले जाया जाता। बस उतनी ही जगह थी उस कमरे में।

मेरा छोटा भाई मुंबई आया तो भी हमने वही किया। ज़मीन पर बिछौना बिछाया जिसपर मेरा छोटा भाई देवेश ज़िद करके सोता और मुझे दीवान पर ही सोने को मजबूर करता। सुबह नाश्ते में हम हमेशा की भांति चाय के साथ ब्रैड-मक्खन या ब्रैड-जैम खाते। एक ही शौचालय/ स्नानघर के लिए सुबह के समय हम चार लोगों की कतार लगी रहती। कार्यालय में उन दिनों स्टाफ़ कम होने के कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी। बहुत मुश्किल से दो दिन की छुट्टी का ही जुगाड़ कर पाया। बाकी दिन छोटे भाई को उसके दिन का कार्यक्रम बनाकर दे देता और वह अकेले ही मुंबई घूमता।

सुबह हम कांदीवली स्टेशन तक ऑटो में जाते। वहाँ से उलटी दिशा में बोरीवली के लिए ट्रेन पकड़ते। फिर बोरीवली से फ़ास्ट या डबल फ़ास्ट ट्रेन लेकर चर्चगेट जाते। कभी-कभी भाई को मैं रास्ते में बांद्रा या दादर उतार देता, आसपास की कोई जगह देखने के लिए। कान्दीवली से उलटे बोरीवली जाने के दो लाभ होते। एक तो बोरीवली से फ़ास्ट या डबल फ़ास्ट ट्रेन मिल जाती, जो कान्दीवली में रुकती ही नहीं थीं। दूसरे, जिस ट्रेन में बोरीवली जाओ, उसी में बैठे रहो। मुंबई लोकल में सीट पाने वाला राजा होता है, बाकी सब धक्के खाने वाली प्रजा। बोरीवली से चढ़ने वालों को भी अक्सर सीट नहीं मिलती थी।

शाम को देवेश मेरे कार्यालय में आ जाता और हम मिलकर मरीन ड्राइव घूमते, कोलाबा या फिर क्रॉफोर्ड मार्केट या फ़ैशन स्ट्रीट में यूं ही जूते घिसाते घूमते और सस्ती वस्तुएँ ढूंढते। वापसी में कोलाबा या दादर या बांद्रा या कान्दीवली के किसी रैस्टौरेंट में भोजन करते और वापस अपने-अपने बिस्तरों पर आकर सो जाते।

आज मैं अपने भाई को एक विशेष रैस्टौरेंट में लेकर आया था। “यह मेरे एक सीनियर का रैस्टौरेंट है,” मैंने उसे बताया था।

“क्या वह भी बैंक में काम करते हैं,” देवेश का यह एक स्वाभाविक प्रश्न था।

“अरे, बैंक में काम करते तो किसी लॉकर में चाभी घुमा रहे होते या किसी कस्टमर से सिर खपा रहे होते,” मैंने उत्तर दिया।

“तो क्या छोड़ दी उन्होंने नौकरी?”

“उनकी नौकरी लगी ही नहीं,” मेरा उत्तर था।

देवेश की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा, “फिर वह आपके सीनियर कैसे?”

फिर मैंने उसे पूरी बात बताई। मेरे उन सीनियर का नाम मनोज था। किताबों की एक दूकान पर मुलाक़ात हुई थी। बातचीत एक किताब को लेकर शुरू हुई थी। मैं पी॰ओ॰ प्रवेश परीक्षा के लिए उस किताब को खरीदने वाला था कि उन्होंने मुझे उससे बेहतर तीन चार किताबें सुझा दीं। मैंने एक दो प्रश्न किए तो उनकी जानकारी को देखकर अचंभित रह गया। उन्होंने वे सारी किताबें पढ़ी हुई थीं। उनका ज्ञान विस्मयकारी था। पता चला कि वह तीन साल से ऐसी विभिन्न परीक्षाएँ दे रहे थे। लगभग सभी परीक्षाओं में इंटरव्यू राउंड तक पहुँच भी जाते थे परंतु उनका सेवा में चयन नहीं हो पाता था।

मैं पहली बार ऐसी कोई परीक्षा दे रहा था और वह तीन साल में ऐसी अनेक परीक्षाएँ दे चुके थे, इस नाते वे मेरे सीनियर थे। उसके बाद से मैं उनके संपर्क में रहने लगा, फ़ोन के माध्यम से भी और व्यक्तिगत मुलाकातों से भी। वह मेरे मार्गदर्शक बन गए थे। वही बताते कि क्या पढ़ना है, किस स्रोत से पढ़ना है और किस विषय में अधिक समय नहीं गंवाना है। लगता था वह न केवल विषयवस्तु के ज्ञाता थे वरन परीक्षा-कला में भी पारंगत थे। फिर उनका चयन क्यों नहीं होता था? बहुत संकोच के साथ यह प्रश्न मैं उनसे भी करता और उत्तर में वह मुस्कुरा भर देते। उनकी मुस्कान के पीछे का दर्द मैं समझ सकता था। उनके मार्गदर्शन से लाभान्वित होकर अनेक लोग आज विभिन्न बैंकों की सेवाओं में थे। परंतु वह आज भी कतार में खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे अपने चयन की।

एक बार उन्होंने बातों-बातों में मुझसे कह ही दिया कि यह उनका अंतिम प्रयास है, बैंक सेवा की परीक्षा का। उनकी बात सुनकर मुझे बहुत निराशा हुई। मैं उनके लिए प्रार्थना करने लगा। साथ ही मुझे यह भी लगने लगा कि जब इतने प्रतिभाशाली व्यक्ति का चयन नहीं हो रहा है तो मेरे चयन की तो संभावना ही नहीं थी। मैंने पूरे मनोयोग के साथ तैयारी शुरू कर दी। मनोज, यद्यपि अपनी लगातार असफलता से हतोत्साहित थे, मेरी सहायता करने में उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।

परीक्षा हुई, इंटरव्यू राउंड हुआ, सेवा के लिए मेरा चयन हो गया परंतु मनोज का चयन इस बार भी नहीं हुआ। मनोज ने मुसकुराते हुए मुझे गले लगाकर बधाई दी परंतु उनकी मुस्कान के पीछे मैं उनका दर्द अनुभव कर रहा था। “तुम मेरी चिंता मत करना। ईश्वर ने मेरे लिए कुछ और योजना बना रखी होगी,” एक दार्शनिक की भांति मनोज बोले।  

एक वर्ष की ट्रेनिंग के बाद मेरे नियुक्ति मुंबई फोर्ट की एक शाखा में हुई। मैंने मुंबई शहर के बारे में सुन रखा था कि उस शहर में बाहर के व्यक्ति का निर्वहन बहुत कठिन है और कोई वहाँ नियुक्ति नहीं चाहता। परंतु यह भी सुन रखा था कि एक बार यदि कोई मुंबई में रह जाए कुछ साल, तो उस शहर को छोड़ना नहीं चाहता।

ट्रेनिंग के इस पूरे वर्ष में मैं मनोज के संपर्क में था। पहले तो प्रायः हर रोज़ ही उनसे बात हो जाती थी। फिर वह व्यस्त हो गए और हमारी बात कम होने लगी। मज़े की बात यह थी कि वह मुंबई में ही थे। प्रतियोगिता परीक्षाओं की तरह ही उनका हमारे शहर से भी मन उकता गया था और वह अपने एक मित्र के पास मुंबई आ गए थे। यहाँ आकर उन्हें पता चला कि स्वयं उनके मित्र एक घटिया सी चॉल में कितनी कठिनाई से रहते थे। मेरे मित्र का संकल्प और अधिक दृढ़ हो गया और वह उसी चॉल में अपने खर्चे पर रहकर चौपाटी में भेलपुरी बेचने लगे। आसान यह भी नहीं था किन्तु पढ़े-लिखे होने के कारण वह इसे संभव बना पाए। परंतु यह उनकी मंज़िल नहीं थी। शीघ्र ही उन्होंने वरली क्षेत्र में किराए की एक दूकान में पकौड़े-भजिया, बड़ा-पाव बेचना शुरू कर दिया। अपने तेज़ दिमाग और किसी काम को छोटा न समझने की सोच के सहारे उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

“आज मनोज के चार रेस्टॉरेन्ट हैं मुम्बई शहर में और उनमें से एक में हमने अभी-अभी भोजन किया है,” कहकर मैंने अपनी बात समाप्त की और एक लंबी सांस ली।

"काश, आपका भी सेलेक्शन पी.ओ. के इम्तिहान में न हुआ होता...” देवेश बुदबुदा रहा था।


 

 

नज़दीक से

- विक्रम शर्मा



Wednesday, December 29, 2010

सुख

मैं एक व्यवसायी हूँ. एक सफल व्यापारी. व्यापार के कायदे कानून ठीक से जानता हूँ. कुछ लोग मुझे पसन्द नहीं करते, पीठ पीछे मेरी बुराई भी करते हैं. मैं जानता हूँ. किन्तु व्यापार में ये सब तो चलता ही है. सामने तो अधिकांश लोग मेरा सम्मान ही करते हैं!

वस्तुतः मैं धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति हूँ. नित नियमित पूजा-पाठ, मन्दिर जाना, दान-पुण्य, चन्दा देना, सभी धार्मिक अनुष्ठानों में नियमित भागीदारी, ये सब मेरे जीवन के अभिन्न अंग हैं.

पिछले सप्ताह एक चमत्कार हुआ. एक योगी बाबा के दर्शन हुए. अपनी आदत के अनुसार मैंने यथासंभव उनकी सेवा की. बाबा प्रसन्न हुए. बोले, "माँगो वत्स; क्या चाहते हो?"

मुझे लगा, मानो साक्षात ब्रह्म के दर्शन हो गये हों.

मांगने को बहुत कुछ था किन्तु मैं कुछ ऐसा मांगना चाहता था जिससे सभी कुछ मिल जाए.

मैंने बचपन में वह कहानी सुनी थी जिसमें एक व्यक्ति को एक सिद्ध पुरुष ने दो वरदान मांगने को कहा. वह व्यक्ति आलसी था और अपनी पत्नी से परेशान भी. उसने दो वर मांगे - एक, उसकी हथौड़ी अपने आप चलती जाए और दूसरे, जब तक वह चाहे, उसकी पत्नी कुर्सी से चिपकी रहे ताकि उसे परेशान न कर सके. ऐसे तुच्छ वरदान मांगकर उसने ऐसा स्वर्णिम अवसर व्यर्थ कर डाला.

मैं ऐसी बेवकूफ़ी नहीं करना चाहता था. अपनी समझ और ज्ञान का परिचय देते हुए मैंने निवेदन किया, "प्रभु! यदि आप मुझ तुच्छ प्राणी पर कृपा करना चाहते हैं तो मुझे सुख प्रदान करें."

"सुख से तुम्हारा क्या अभिप्राय है, वत्स. इम्पोर्टेड कार, एयरकण्डीशनर, कोठी - तुम किस वस्तु को सुख मानते हो? बोलो पुत्र, आज हम प्रसन्न हैं," योगीश्री मुस्कुराते हुए बोले.

मैं किसी वस्तु विशेष का नाम लेकर अपने वरदान को सीमित नहीं करना चाहता था. योगी थे, कि मुझसे स्पष्ट शब्दों में निवेदन करने को मुझे बाध्य कर रहे थे. मैंने तनिक विचार कर पुनः निवेदन किया, "प्रभु! मैं तुच्छ प्राणी क्या निवेदन करूँ? सुख का जो भी अर्थ आपकी दृष्टि में हो, मुझे वही प्रदान कर कृतार्थ करें."

योगी महाराज ने अर्थपूर्ण निगाहों से मुझे देखते हुए पूछा, "हमारी दृष्टि का सुख पाकर तुम प्रसन्न तो होगे बच्चा?"

"क्यों नहीं महाराज," मैं अपनी सफलता पर अभिभूत था. अन्ततः मैंने योगीश्री को मनचाहा वर देने के लिए राजी कर ही लिया था!

"तथास्तु," कहकर उन्होंने अपने कमण्डलु से पानी के छींटे मेरे मुँह पर दे मारे.

पलक झपकते ही मेरी काया-पलट हो गयी. मेरी वेशभूषा एक साधू के समान हो गयी. भगवा वस्त्र, हाथ में कमण्डलु, मस्तक पर तिलक, गले में मालाएँ. मैं अचम्भित, किंकर्त्तव्यविमूढ़ था.

"चलो बालक, तुम इस संसार से मुक्त हो. आज से तुम सन्यस्त हुए. अब तुम हमारे साथ हिमालय की कन्दराओं में तप के लिए प्रस्थान करो," योगी जी महाराज पूर्ववत मुस्कुराते हुए, किन्तु आदेशात्मक स्वर में बोले.

मेरा जैसे स्वप्न भंग हुआ. योगी के चेहरे की मुस्कान मुझे कुटिल लगने लगी. उनकी शक्ति का चमत्कार मैं देख चुका था, अभी-अभी भुगत चुका था. प्रतिवाद करना खतरे से खाली न था. इस विषम परिस्थिति में भी मैंने आत्मसंयम खोया नहीं. योगी के चरणों में मैं साष्टांग लेट गया और निवेदन किया, "भगवन! आप महान हैं. किन्तु मैं तो आपसे सुख मांग रहा था और आप मुझसे मेरा सब कुछ छीन ले रहे हैं! क्षमा याचना करता हूँ प्रभु, किन्तु मैंने ऐसा तो नहीं कहा था."

योगी अभी भी यथावत थे. मेरी आशंका के विपरीत वह क्रोधित न हुए. बोले, "बच्चा. हमारी दृष्टि का सुख तो यही है. इस नश्वर संसार को त्याग कर प्रभु की शरण में जाने वाले मार्ग से सुन्दर कोई मार्ग नहीं है और इस मार्ग पर चलने से बढ़कर कोई सुख नहीं!"

मेरी समझदारी ही मेरी दुश्मन बन गयी थी. मैं अपने ही चक्र में फंस गया था. इससे तो अच्छा होता मैं एक नया बंगला मांग लेता, अपनी पत्नी का स्वास्थ्य, बच्चों के लिए अच्छा व्यवसाय, या फिर और कुछ! यह मैं क्या मांग बैठा!

मैंने योगी के पाँव कसकर पकड़ लिये. आवाज़ में यथासंभव आदर-भाव लाकर मैंने पुनः निवेदन किया, "प्रभु! मैं यह वरदान पाकर धन्य हो गया. किन्तु मेरे हालात कुछ ऐसे हैं कि मैं अभी सन्यास नहीं ले सकता. बच्चे अभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हुए हुए; मेरा अपना व्यवसाय भी अभी कुछ विशेष जमा नहीं. ऐसे में मैं तो सन्यास लेकर निश्चित ही धन्य हो जाऊंगा किन्तु मेरे बीवी-बच्चों के साथ तो यह अन्याय हो जाएगा! क्षमा चाहूँगा भगवन, किन्तु मैं यह अन्याय कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाता हूँ."

मुझे भय था कि यह सुनकर योगी रुष्ट हो जाएंगे. वह मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले, "वत्स! मनुष्य की तर्क-पद्धति बहुत विचित्र है. वह किसी नियम के अनुसार नहीं चलती बल्कि अपने किंचित स्वार्थ एवं सुविधा से परिचालित होती है. मनुष्य स्वयं को कितना भी बुद्धिमान क्यों न माने, वह नहीं जानता कि उसका हित क्या है और शुभ क्या है. हम तुमसे तर्क-वितर्क करने नहीं आये. हमने तुम्हें एक वरदान मांगने को कहा और तुमने उसका प्रयोग कर लिया."

मुझे लगा जैसे उस योगी ने मुझे तान्त्रिक-शक्ति से कैद कर लिया हो. मन ही मन छटपटाते हुए मैंने विनम्रतापूर्वक रुंधे गले से कहा, "प्रभु! मैं, आपसे और वरदान नहीं मांग रहा. मैं तो मात्र इतना निवेदन कर रहा हूँ कि मुझे आप पूर्ववत सामान्य व्यक्ति बना दें. मुझे सन्यास लेने के लिए बाध्य न करें."

योगी महाराज के चेहरे के भाव पढ़ना कठिन था. वह बोले, "भक्ति का मार्ग मनुष्य को सुख देता है, उसे प्रतारणा नहीं. हम तुम्हारा मार्ग प्रशस्त तो कर सकते हैं, तुम्हें भक्ति नहीं दे सकते. भक्ति की कृपा तो स्वयं ईश्वर ही कर सकता है."

"परेशान न हो बच्चा. यह मार्ग तुम्हारे मांगने पर ही हमने तुम्हें दिया था. इसपर चलने के लिए तुम बाध्य नहीं हो," कहते हुए योगी ने पुनः जल के कुछ छींटे मुझ पर मारे. मैं पूर्ववत हो गया.

मैंने योगी के चेहरे को देखा. मुझे अब उस चेहरे पर व्याप्त मुस्कान कुटिल नहीं बल्कि भव्य और महान दीख रही थी. उनके मस्तक पर अपूर्व तेज था. इतनी सरलता से छुटकारा पाकर मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था. मुझे लगा, जैसे मैं उनके मस्तक के तेज को आत्मसात कर लूँ.

मैंने एक बार पुनः अपना सिर उन महान योगी के चरणों में रखकर निवेदन किया, "मुझसे भूल हो गयी भगवन! मुझे क्षमा करें. वस्तुतः मैं भक्तिमार्ग अपना सकूँ, इस योग्य नहीं हूँ, इसका ज्ञान तो आपने मुझे करा दिया. आपकी दृष्टि के सुख को मैं सुख नहीं मान सका क्योंकि मेरा हृदय अभी अपवित्र है. ईश्वर ने इसीलिए मुझे भक्ति का दान नहीं दिया. यह भी मैं समझ गया. किन्तु सुख की प्राप्ति के लिए क्या सन्यास लेना आवश्यक है?"

"कदापि नहीं पुत्र. एक सन्यस्त व्यक्ति का सुख सच्चे सन्यास में है. एक गृहस्थ के लिए सुख की परिभाषा यह नहीं," योगी महाराज ने स्पष्ट कहा.

"तो फिर ग्रृहस्थ का सुख क्या है? सुख देने वाली प्रायः सभी वस्तुओं का संग्रह और उपभोग मैं कर रहा हूँ. फिर भी मैं सुखी अनुभव क्यों नहीं करता," मैंने जिज्ञासा व्यक्त की.

"क्योंकि जिसे तुम सुख कह रहे हो, वह सुख है ही नहीं. ये सब तुम्हारी आकांक्षाएं मात्र हैं जिनका जन्म माया की चकाचौंध से हुआ है. इन आकांक्षाओं की पूर्ति की हवस में मनुष्य सुख का विचार ही नहीं करता.

अन्तर्मन में सच्चे सुख का अहसास होते हुए भी मनुष्य उसके प्रति आंखें मूंद लेता है - वह उसे निर्मूल प्रतीत होता है. सुख के पीछे मनुष्य की दौड़ सिर झुका कर दौड़ रहे सूअर की दौड़ के सदृश है. क्या यह दौड़ उसे वास्तविक सुख दे सकती है? ऐसा सुख तो मनुष्य के आत्मक्षय का कारण ही बन सकता है. इस सुख की अभिलाषा ही व्यक्ति को क्षोभ व असन्तोष देती है - और अन्ततः विक्षिप्तता!"

"तो क्या मनुष्य इच्छा करना छोड़ दे, कार्य करना ही छोड़ दे," मैंने बीच में टोका.

"इच्छा किसकी? बहुधा मनुष्य धन, सत्ता और शक्ति में सुख ढूँढता है. यह सुख नहीं, सुख का भ्रम है. इस सुख की प्राप्ति में व्यक्ति मदमस्त हो सकता है, सुखी नहीं. और यही सुख मनुष्य को अनवरत भय और पीड़ा भी देता है. भय, अपने संग्रहीत ’सुखों’ के खो जाने का, और पीड़ा इनके वास्तव में खो जाने पर; क्योंकि ये समस्त सुख नश्वर ही तो हैं," योगीश्री सीधे-सीधे सच बोलते जा रहे थे. ऐसा सच जिससे हम सब बचते-फिरते हैं.

"धन, शक्ति और सत्ता की नहीं तो फिर किन सुखों की इच्छा मनुष्य को करनी चाहिए," मैं स्वयं को रोक नहीं पाया, यह प्रश्न करने से.

"प्रत्येक मनुष्य जानता है कि सुख क्या है. आवश्यकता है उसे पहचानने की. एक रुग्ण व्यक्ति जानता है कि उसे हलका-फुलका आहार लेना चाहिए. फिर भी उसे चाट-पकौड़ी और पकवान ही आकृष्ट करें तो वह उनका सेवन स्वास्थ्य की कीमत चुका कर ही कर सकता है," योगीश्री ने स्पष्ट किया.

"फिर भी कृपा कुछ तो स्पष्ट करें कि सुख क्या है! मैं मूर्ख उससे कुछ दिशा-निर्देश ही ले लूँगा," मैंने आग्रह किया.

"सुख है प्रेम करना - सम्पूर्ण जगत से - बिना प्रतिदान की अभिलाषा के.

"मनुष्य का शरीर नश्वर है पुत्र. शाश्वत तो है केवल मनुष्य का विवेक, विश्वास और प्रेम. यह प्रेम उस निराकार ब्रह्म से भी हो सकता है और उसके द्वारा रची गयी इस सृष्टि से भी," योगी जी महाराज पूर्ववत मुस्कुरा रहे थे!

नज़दीक से

- विक्रम शर्मा

संत्री और मंत्री

मई का महीना समाप्त होने को था. दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी से त्रस्त दिल्लीवासी किसी न किसी शीतल स्थल की तलाश में भटक रहे थे. अवसर पाकर हमने भी बाहर घूमने का कार्यक्रम बना लिया. दिल्ली के आसपास के पर्वतीय स्थल तो कई बार देखे हुए थे, इस बार मध्य-भारत के प्रसिद्ध पंचमढ़ी के वनों में घूमने का मन बनाया.

मध्य प्रदेश की सतपुरा पर्वत श्रृंखला में शहरों की भीड़ और प्रदूषण से दूर स्थित एक शांत और साफ़-सुथरा छोटा सा स्थान है पंचमढ़ी. समुद्र तल से 1100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित पंचमढ़ी अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य समेटे हुए है. पाँच पाण्डवों की गुफ़ाओं के कारण पंचमढ़ी कहलाने वाले इस पर्वतीय स्थल को गहरे सरोवर, झरने एवं विश्रांत घने वन एक अनुपम छटा प्रदान करते हैं. मनुष्यों द्वारा छेड़-छाड़ से मुक्त इसका प्राकृतिक सौन्दर्य इस स्थल के प्राकृतिक सौन्दर्य नैसर्गिक चट्टानों की आकृतियों और मन्दिरों की सम्पदा से सम्पन्न है. घाटियों, लाल रेतीली चट्टानों, टीलों और जल-प्रपातों के रूप में प्रकृति मानो निमन्त्रण दे रही हो!

पंचमढ़ी भोपाल से लगभग 200 कि. मी. दूर स्थित है. रमणीय पहाड़ी मार्ग से होते हुए लगभग चार से पाँच घण्टे का समय लगता है वहाँ पहुँचने में. जैसे-जैसे पँचमढ़ी निकट आता जाता है, दोनों ओर वनप्रान्त में से निकलते हुए सड़क पर वाहन में यात्रा करने का अपना अलग ही आनंद आता है.

पँचमढ़ी पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी. अगले दिन रविवार था. होटल के स्टाफ़ के साथ विचार-विमर्श कर अगले दिन इस सुन्दर स्थल के विहार का कार्यक्रम बना लिया. हमें बताया गया कि इन पहाड़ी मार्गों पर निजी वाहनों पर घूमना व्यावहारिक नहीं था क्योंकि कई मार्ग कच्चे थे और ऊबड़-खाबड़ थे. अतः हम स्टाफ़ को एक जिप्सी का प्रबन्ध करने के लिए कह दिया.

अगले दिन सुबह कार्यक्रमानुसार सुबह-सुबह हम तैयार हो गये. किन्तु जिप्सी नहीं आयी. पता चला कि भारतीय संसद में विपक्ष के नेता के पंचमढ़ी-भ्रमण के कारण सुरक्षा की दृष्टि से स्थानीय पोलीस ने अधिकांश जिप्सियों का अधिहरण कर लिया था. बाकी जिप्सियों के मालिकों ने अपनी जिप्सियाँ पोलीस के डर से छुपा दी थीं. कोई जिप्सी नहीं, मतलब कोई घूमना-फिरना नहीं. जहाँ-जहाँ साधारण टैक्सी जा सकती थी, वहाँ तो हम हो आये किन्तु मुख्य पर्यटक-स्थलों यथा जटाशंकर, पाण्डव गुफ़ाएं, अप्सरा विहार, महादेव गुफ़ा, रजत प्रपात, राजेन्द्र गिरि, चौरागढ़, धूपगढ़ आदि का भ्रमण हम नहीं कर पाये. होटल में ठहरे कुछ लोग तो कहीं भी नहीं गये - इस आशा में कि अगले दिन हालात बेहतर हो जाएंगे और वे जिप्सी में ही घूम लेंगे.

शाम को हम स्थानीय बाज़ार में घूम रहे थे. पैदल घूम-घूम कर जूते की शामत आ गयी थी. उसे ठीक कराने के लिए चर्मकार की सेवाएँ ले रहे थे. वहाँ तीन-चार चर्मकार एक साथ बैठे थे. उनमें से एक खाली बैठा था और ज़ोर-ज़ोर से स्वगत संभाषण दे रहा था: "ये मन्त्री (उसका तात्पर्य राजनैतिक नेताओं से था) खुद तो ए.सी. कारों में आएंगे, ए.सी. होटलों में ठहरेंगे, सब तरह की ऐश-मौज करेंगे. आम आदमी की दिक्कतों से इनका क्या लेना-देना! उनकी बला से! आम आदमी चाहे जिये, चाहे मरे. और ये सन्त्री (अर्थात नौकरशाह) तो और भी ज़्यादा बेदर्द हैं, मन्त्रियों से भी ज़्यादा. एक आदमी के कारण हज़ारों लोगों की रोटी छिन गयी है, बेवजह!"

हमारी ओर इशारा करते हुए वह बोला, "आप लोग हज़ारों मील दूर से आये हैं, पैसा खर्च करके. कुछ देखने आये हैं कि होटल के कमरे में कैद होने? बरबाद हो गया सब पैसा. वापस घर जाएंगे तो क्या बताएंगे, देख आये पंचमढ़ी? कौन भरपाई करेगा इस नुकसान की? कैसा लग रहा होगा आप लोगों को?

"ये अखबार टी.वी. वाले भी आये हैं मन्त्री जी के पीछे-पीछे! इण्टर्व्यू करते फिर रहे हैं लोगों का. ऊटपटांग सवाल पूछे जा रहे हैं, मौसम कैसा है.. कैसा लग रहा है.. अरे, कोई पूछ रहा है कितनी तकलीफ़ में हैं सब? कोई नहीं पूछता हमसे, शाम को क्या खिलाएंगे बच्चों को?

मैं हैरान था इस अभिभाषण से! इस प्रकटतः अनपढ़ व्यक्ति ने कितनी सुन्दरता से पूरी व्यवस्था पर टिप्पणी कर सार प्रस्तुत कर दिया था. नेताओं से लेकर नौकरशाह और मीडिया तक सीख सकते थे इस निर्धन आम आदमी से!

रात को होटल के डाइनिंग हॉल में होटल का स्टाफ़ भोपाल से नेता जी की सुरक्षा एवं अन्य व्यवस्था करने के लिए आये और होटल में ठहरे नौकरशाहों की आवभगत करने में व्यस्त था. हम जेब से पैसा खर्च करके ठहरे मेहमानों के साथ दोयम दर्ज़े के नागरिकों जैसा व्यवहार किया जा रहा था. मुझे रह-रह कर उस चर्मकार की बातें याद आ रही थीं!

अगले दिन, नेताजी का शहर में आगमन नियत था. हालात और भी खराब थे. कोई जिप्सी नहीं थी, पिछले दिन की तरह. आज तो निजी वाहनों को भी अनुमति नहीं थी पर्यटक स्थलों पर जाने की. नेताजी की सुरक्षा की खातिर! जो लोग रविवार को कमरे में ठहरे रहे, अब उनके पास दो दिन और कमरों में बन्द रहने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं था.

मंगलवार प्रातः लौट के बुद्धू घर को आये. सोचा, फिर कभी दोबारा आएंगे पंचमढ़ी.

अगले सप्ताह बिटिया को मुम्बई के लिए विमान लेना था, दिल्ली एयरपोर्ट से. धौला कुआं के पास हमारा वाहन ट्रैफ़िक जाम में फंसा हुआ था. पता चला, प्रधानमन्त्री एयरपोर्ट जा रहे थे, जिसके कारण आम ट्रैफ़िक रोक दिया गया था. विलम्ब के कारण उड़ान छूट गयी, एयरपोर्ट पर अफ़रातफ़री में बिटिया का नया मोबाइल खो गया.

क्षोभ में एक पुराने समाचार-पत्र की सुर्खियों ने अचानक ध्यान आकृष्ट कर लिया, ’वी. आई. पी. की उड़ान के कारण तीन जैट विमान दुर्घटना से बचे.’ समाचार कुछ इस प्रकार था, "... वी.आई.पी. आवागमन के कारण आज जयपुर एयरपोर्ट के ऊपर तीन विमानों में ईंधन समाप्त हो गया और वे बाल-बाल बचे. इन तीन विमानों में उस समय 450 से अधिक यात्री सवार थे. आज कुल 11 उड़ानें जयपुर, चण्डीगढ़ एवं लखनऊ की तरफ़ मोड़ दी गयी थीं, जबकि 20 उड़ानें लगभग एक घण्टे तक दिल्ली एयरपोर्ट के ऊपर चक्कर लगाती रहने को मजबूर थीं. राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की चीन-यात्रा एवं तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष गुर्बांगुली बेर्दिमुन्हा के आगरा भ्रमण के कारण एयरपोर्ट एक घण्टे से अधिक समय के लिए बन्द कर दिया गया था."

कुछ ही दिन बाद प्रधानमन्त्री की सुरक्षा के लिए किये गये बन्दोबस्त के कारण कानपुर में अमन खान नामक आठ वर्ष के एक बालक की मृत्यु का समाचार छपा.

कहते हैं, समय के साथ सभी घाव भर जाते हैं. पंचमढ़ी वाला अनुभव हो अथवा दिल्ली एयरपोर्ट वाला, हमारा कष्ट समय के साथ दूर हो ही जाएगा! किन्तु आठ वर्ष के उस नन्हे बालक के माता-पिता का दर्द क्या समय भी दूर कर पाएगा? किन्तु इन सन्त्रियों और मन्त्रियों को इससे क्या!

नज़दीक से

-विक्रम शर्मा

क्लब बुद्धिवादी

मैं हतप्रभ हूँ! मुझे क्लब बुद्धिवादी से निष्कासित किया जा रहा है. ये लोग मुझे निष्कासित करेंगे? ये आधे दिमाग वाले लोग स्वयं को बुद्धिवादी कहते हैं जिन्हें अपने हित की समझ तक नहीं?

बुद्धिवादी क्लब हमारी पैतृक परम्परा का अंग रहा है. मेरे दादाजी और दादी जी इस क्लब के आजीवन सदस्य थे. उस ज़माने में इस क्लब की सदस्यता कम ही लोगों के पास होती थी. महत्त्वाकांक्षाएं सीमित हुआ करती थीं. क्लब की सदस्यता की होड़ कम होती थी. क्लब की सदस्यता के लिए अपेक्षित था पढ़ा-लिखा होना, सामान्य ज्ञान और धर्म का ज्ञान होना. दादाजी तो बहुत पढ़े-लिखे थे, किन्तु दादी जी औपचारिक रूप से विशेष पढ़ी-लिखी नहीं थीं. फिर भी उन्हें इस क्लब की सदस्यता मिल गयी थी - अपने धार्मिक आचरण तथा धार्मिक पुस्तकें एवं मन्त्रादि कण्ठस्थ होने के आधार पर.

समय के साथ-साथ इस क्लब की सदस्यता की उपयोगिता बढ़ने लगी. सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए एक सहज सीढ़ी के रूप में इसका प्रयोग किया जाने लगा और इसकी सदस्यता के लिए होड़ लगने लगी. पारिवारिक परम्परा का निर्वहन करते हुए मेरे माता-पिता भी इस क्लब के आजीवन सदस्य रहे और उन्होंने मुझे 20 वर्षों की औपचारिक शिक्षा दिलायी जिससे मैं भी इस क्लब का एक सम्मानित सदस्य बन सकूं.

सतत परिवर्तनशील बुद्धिवादियों से स्वयं बुद्धिवाद भी नहीं बच सका. समय के साथ-साथ बुद्धिवाद की परिभाषा भी बदलती गयी. जो धर्म कभी बुद्धिवाद की पहली शर्त हुआ करता था, अब एक बड़ी अयोग्यता बन गया! पहले कभी बुद्धिवादी और पण्डित शब्द पर्यायवाची हुआ करते थे. अब तो पण्डित शब्द बुद्धिवादियों के लिए किसी गाली से कम नहीं!

उसी क्रम में आज बुद्धिवादी क्लब से मुझे निष्कासित करने की बात की जा रही थी.

लोग चीख-चीख कर कह रहे थे, "निकालो इस जाहिल को बाहर. इसे पहले भी कई बार चेतावनी दी जा चुकी है. यह वही है न जो एम. एफ़. हुसैन द्वारा बनायी गयी हिन्दू देवी-देवताओं की नग्न पेण्टिंग्स पर आपत्ति कर रहा था? अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर उंगली उठाता है! वह भी दो कौड़ी के धर्म, परम्परा एवं आस्था के नाम पर! बाहर निकालो इस बेवकूफ़ को इस क्लब से!"

दूसरी तरफ़ से आवाज़ आयी, "और सार्वजनिक स्थलों पर मर्यादा में रहने की बात भी तो यही कर रहा था! वैयक्तिक स्वतन्त्रता पर पहरा लगाने वाले इस गँवार को भीतर आने किसने दिया? वैयक्तिक स्वतन्त्रता पर किसी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता."

मैंने प्रतिरोध किया, "वैयक्तिक स्वतन्त्रता का अर्थ समझते हैं आप? वैयक्तिक स्वतन्त्रता के नाम पर यदि मैं आपको गाली दूँ तो क्या आपको स्वीकार्य होगा?"

"अवश्य स्वीकार्य होगा. उसके बाद हम तुझे पीटने के लिए भी तो स्वतन्त्र हैं," उसी कोने से ठहाका गूँजा.

"यह तो एकदम जाहिल व्यक्ति है. उस दिन यह मुक्त यौन सम्बन्धों को व्यभिचार कह रहा था," फ़्रैंच-कट दाढ़ी वाले बुद्धिवादी ने बहुत सोच-समझ कर कहा. "और विवाह किए बिना लिव-इन सम्बन्धों पर भी को भी अनुचित कह रहा था यह," लम्बे बालों को चुटिया में बांधते हुए हुए एक प्रौढ़ बुद्धिवादी ने जड़ा.

क्लब में मेरे कुछ मित्र भी थे. मैंने समर्थन की अपेक्षा से उनकी ओर देखा. वे असहाय दिख रहे थे. बहुमत में बहुत शक्ति होती है. बहुमत चाहे बुद्धिवादियों का हो अथवा अनपढ़ लोगों का, उसका चरित्र एक-सा होता है - बेपरवाह और गैर-जिम्मेदाराना.

मुझे अकेला पाकर समवेत स्वर में पुकार होने लगी, "इस दकियानूसी को बाहर निकालो. हमें परिवर्तन चाहिए. बुद्धिवादी क्लब परिवर्तन के लिए है. सब बदल डालो. सब परम्पराओं को मिटा डालो. जो परिवर्तन नहीं चाहता उसे दकियानूसी क्लब में डाल दो. बाहर करो इसे."

"यदि यही बुद्धिवाद की परिभाषा है, तो मुझे स्वयं नहीं रहना बुद्धिवादी. किन्तु भगवान के लिए मुझे दकियानूसी तो न कहो." भारी मन से यह कहकर बाहर निकलने के लिए मैंने दरवाज़ा खोला. दरवाज़ा सीधे दकियानूसी क्लब में खुलता था. मैंने घबराकर दरवाज़ा बंद किया और वापस आ गया. बुद्धिवादी ठहाका मारकर मेरा उपहास उड़ा रहे थे. मैंने भागकर दूसरा दरवाज़ा खोला. वह भी दकियानूसी क्लब में ही खुलता था. एक-एक कर मैंने सारे दरवाज़े खोल कर देख लिए. सब दकियानूसी क्लब में ही खुलते थे.

मैं थकावट से हाँफ़ रहा था. एक परिपक्व से दिखने वाले बुद्धिवादी कह रहे थे, "दो ही रास्ते हैं तुम्हारे पास. या तो दकियानूसी कहलाने को तैयार हो जाओ, वरना जैसा हम कहें, वैसा ही तुम भी कहो!"

अब मुझे समझ आ रहा था कि क्यों मेरे मित्र इतने असहाय थे; मुझसे सहमत होते हुए भी मुझे समर्थन देने में असमर्थ क्यों थे.

नज़दीक से

-विक्रम शर्मा