Wednesday, September 2, 2020

रुतबे वाले

एक प्रॉपर्टी डीलर का फ़ोन था। उससे बात कर फ़ोन काटा तो अनायास तोतले डॉक्टर साब का स्मरण हो आया।

हमारे मोहल्ले के सबसे अधिक लोकप्रिय डॉक्टर थे वह। उनका नाम याद रखने का कष्ट कोई नहीं करता था, सब उन्हें तोतला डॉक्टर के नाम से ही जानते थे। वैसे भी उनके क्लीनिक पर बोर्ड लगा तो था, परन्तु उस पर क्या लिखा था, कोई पढ़ नहीं पाता था। बरसों पुराना बोर्ड था, टूटा फूटा, धूल मिट्टी, बारिश के हज़ारों थपेड़ों ने उसे बदरंग, बेहाल कर रखा था। परन्तु डॉक्टर साब ने शायद कभी उसे देखा ही नहीं। उनकी प्रैक्टिस तो वैसे ही खूब चलती थी।

डॉक्टर साब तोतले थे परन्तु बात करने के बहुत शौकीन थे। कहने को तो उनका क्लीनिक सारा दिन खुला रहता था, परन्तु वह अपने क्लीनिक में कम और आस-पास की दुकानों में अधिक पाए जाते थे, बतियाते हुए। कई बार तो वह किसी और की दूकान में बैठकर मरीज़ों का इलाज भी कर दिया करते थे। कई लोग पसंद भी करते थे, किसी और दूकान में दिखाना, क्योंकि कहीं और बैठ कर वह मरीज से अपनी फ़ीस नहीं लेते, "अले तभी त्लीनित में आओदे तो लेंदे पैसे, यहां त्या लेने पैसे!" वैसे, अपने क्लीनिक में भी अपनी फ़ीस लेने से अक्सर शरमाते थे वह, "अले, अदली बाल तभी आओदे तो लेे लेंदे पैसे, धल ती ही तो बात है।"

पूरे मोहल्ले के चहेते थे डॉक्टर साब। किसी को कैसी भी ज़रूरत हो, डॉक्टरी परामर्श की या फिर कैसी भी, एक व्यक्ति जिसका विचार सबसे पहले आता था, वह थे तोतले डॉक्टर साब।

एक दिन मैं उनके क्लीनिक में गया तो उन्होंने तुरंत मिठाई का डिब्बा आगे कर दिया। बहुत प्रसन्न थे वह, "दमीन ती रजिस्त्री तरवाई है आद। अपना मतान बनवाना है अब!"

उस दिन से वह आसपास की दुकानों में दिखने बंद हो गए। मकान बनवाना शुरू कर दिया था उन्होंने। हर रोज़ वहीं जाते थे, राज मिस्त्रियों के साथ खड़े होकर बनते हुए मकान की देखभाल करते थे। "अले, पूली फैमिली ता सपना है, अपना मतान। दूसरों पर तैसे छोड़ सतते हैं?" 

एक अनधिकृत बस्ती में प्लॉट खरीदा था डॉक्टर साब ने। अब जो डॉक्टर अपनी फ़ीस लेने में भी शरम करेगा, वह किसी पॉश इलाके में तो मकान लेे नहीं सकता! एक छोटे से प्लॉट में डॉक्टर साब अपने सपनों का आशियाना बना रहे थे। उनकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। 

एक दिन डॉक्टर साब बहुत मायूस बैठे थे अपने क्लीनिक में। मैं यूं ही चला गया था, उनसे उनके मकान की प्रगति के बारे में पूछने। रुआंसे डॉक्टर साब ने जवाब दिया, "मतान तो पूला हो दया है, मदल उसे एत दुंडे ने तिसी औल तो बेत दिया।"

मैं समझा नहीं। उनका मकान किसी और ने किसी तीसरे को बेच दिया! यह कैसे संभव है? उन्होंने विस्तार से बताया कि उस गुंडे के पास भी उस मकान के काग़ज़ात थे और अब उस मकान पर कब्ज़ा भी किसी और का है। "तुछ नहीं हो सतता। मैंने बात तल ली है, वतीलों से।" उन्हें सांत्वना देकर मैं घर जा रहा था तो मन उद्वेलित था। चाहता था कुछ करूं उनके लिए परन्तु विवश था।

कुछ दिन बाद उनके क्लीनिक के सामने से गुज़रा, तो मेरी निगाहें दूसरी ओर थीं। उनसे निगाहें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। सपने चूर चूर होने का दर्द मैं समझ पा रहा था। परन्तु भीतर से डॉक्टर साब ने मुझे देख लिया था। ज़ोर से मेरा नाम पुकारते हुए बाहर आए और मुझसे खुशी से लिपट गए, "मैंने आपती आंथों में अपने लिए दर्द देथ लिया था उस दिन। मैं आपते धल आने ती सोच ही लहा था आपतो थुशथबली देने।" 

"क्या मकान वापस मिल गया आपका?" अति उत्साह में मैंने तुरन्त पूछ लिया।

"मेला मतान तो नहीं, वह तो बित दया था न! उस दुंडे ने मुझे एत दूसला मतान दिला दिया है। तल उसती रजिस्त्री भी हो दयी औल तब्जा भी। तब्जा हो जाए तो तोई फितर नहीं," डॉक्टर साब बहुत खुश थे, "एत पेशंत है, मेरा, बहुत लुतबे वाला, उसने तला दिया यह ताम।"

वहां से निकला तो मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह बात खुश होने की थी अथवा नहीं। डॉक्टर साब की खुशी में तो मैं खुश था, परन्तु सोच रहा था, उस व्यक्ति के बारे में जिसका मकान उस गुंडे ने डॉक्टर साब को दे दिया था। उस बेचारे के पास यदि किसी रुतबे वाले तक पहुंच नहीं हुई तो? क्या उसके जीवन भर की कमाई यूं धोखाधड़ी से कोई दूसरा छीन लगा? कैसी है हमारी कानून व्यवस्था?

कई दिन परेशान रहा, यह सोचकर कि क्या हुआ होगा उस व्यक्ति का। बेबस था, उसकी मदद नहीं कर सकता था। हां, अपने लिए अवश्य एक सबक लिया कि कभी अनधिकृत क्षेत्र में मकान नहीं खरीदूंगा, चाहे सारी उम्र किराए के मकान में रहना पड़े।

दशकों हो गए इस घटना को। जीवन भर इस बात को मैंने गांठ बांधे रखा। अनेक अवसर आए, पक्की रजिस्ट्री, मीठा पानी के वायदे के साथ सस्ता मकान लेने की परन्तु मैं किसी नामी बिल्डर से मकान खरीदने के अपने निर्णय पर अडिग रहा। अंततः अपनी जेब के अनुसार एक फ़्लैट मिल ही गया। कुछ जमापूंजी, पी. एफ. और बाकी बैंक से लोन लेकर फ़्लैट की पूरी कीमत अदा कर दी, एक अच्छा सा डिस्काउंट लिया और तीन साल में फ़्लैट के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। आज आठ वर्ष हो गए हैं और फ़्लैट अभी भी उतनी ही दूर है मुझसे, जितना उस मनहूस घड़ी में था, जब मैंने इसे खरीदने का निर्णय लिया था। जिस घर में रह रहा हूं, उसका किराया तो दे ही रहा हूं, घर के राशन से पहले हर महीने इस फ़्लैट के लिए जो लोन लिया था, उसकी किस्त का भुगतान कर रहा हूं आठ वर्षों से।

अभी अभी एक प्रॉपर्टी डीलर का फ़ोन आया था। उसने यह प्रस्ताव दिया है कि कोई पार्टी है जो इस फ़्लैट के बदले किसी अन्य बिल्डर का एक दूसरा फ़्लैट देने को तैयार है। साथ में बस, बीस लाख और देने होंगे। 

सोच रहा हूं, क्या डॉक्टर साब से भी उस गुंडे ने बीस लाख और मांगे होंगे? या फिर उस रुतबे वाले ने?


- नजदीक से

Friday, July 3, 2020

खिड़की के बाहर


पंछी नदिया पवन के झोंके
कोई सरहद ना इन्हें रोके
सरहदें इन्सानों के लिए हैं
सोचो तुमने और मैंने क्या पाया
इन्सां हो के ...

एफ.एम. रेडियो पर यह गाना बज रहा है। एक समय था मैं छायावाद से बहुत प्रभावित था। रेडियो पर बजता यह गीत सुनकर तो मानो हृदय हिलोरें लेने लगता था।

कभी मैं स्वयं को एक पंछी की भांति उड़ता हुआ अनुभव करता, दूर, सुदूर क्षेत्रों में, स्वच्छंद, मस्ती के साथ, बिना कुछ सोचे, चारों ओर विस्तृत प्रकृति का रसास्वादन करते हुए।

कभी मैं एक नदी बनकर बहता हुआ महसूस करता, कभी हिमखंडों के नीचे से चुपके से बह जाता तो कभी छलछल कर चट्टानों को काटते हुए मदमस्त बहता। कभी समतल पर कलकल कर नीरवता के साथ ध्यानावस्था में शांतचित्त बहता रहता तो कभी ऊबड़ खाबड़ धरती पर एक चंचल बच्चे की भांति हिलोलें मारता।

कभी मैं एक पवन का झोंका बन लोगों के चेहरों को स्पर्श करता हुआ आगे बढ़ जाता तो कभी उन्हें जीवनदायिनी श्वास देता हुआ बस, बहता रहता। कभी साथ में ऊष्मा लिए लोगों को सूर्य की शक्ति का अहसास कराता तो कभी बादलों के कणों को अपने आंचल में समेटे हुए उन्हें छूता और उन्हें भी अपनी तरह रूमानी बना देता।

अब इस गीत का वैसा असर मुझपर नहीं होता। यथार्थ मुझे वैसा कुछ सोचने ही नहीं देता। समय के साथ एड़ियां सख्त हो जाती हैं, त्वचा मांसपेशियों का साथ छोड़ने लगती है और हड्डियां अकड़ जाती हैं। जब उठकर बैठना मुश्किल हो जाए तो उड़ने के बारे में कोई कैसे सोचे!

मेरे कमरे की एक छोटी खिड़की बाहर गली में खुलती है। वह खिड़की बाहर की दुनिया से मुझे जोड़े रखती है।

दरअसल, यह पिताजी का कमरा है। इसे पिताजी के ज़माने में बैठक कहा जाता था। कमरे में एक तख्त है, एक शीशम की लकड़ी की मेज़ और दो कुर्सियां ही बची हैं। घर के पुनर्निर्माण के समय पिताजी वाले कमरे और बाहर के छोटे टॉयलेट को नहीं छेड़ा गया। उसे उसकी मूल सादगी के साथ पूर्ववत रहने दिया, 'सादा जीवन, उच्च विचार' के महान दर्शन के प्रतीक के रूप में।

पिताजी का मानना था कि बाहर के लोगों को यथासंभव घर के भीतर प्रवेश नहीं करना चाहिए। उस ज़माने में अधिकांश लोग ऐसा ही सोचते थे। टॉयलेट अलग होते थे और सोने के कमरे अलग। घर में सबसे बाहर एक टॉयलेट होता था और बाहर के लोग उसी टॉयलेट को प्रयोग करते थे। परिवारजनों के लिए टॉयलेट और बाथरूम भीतर अहाते में थे। बेड रूम्स के साथ अटैचड टॉयलेट के बारे में तो कोई सोच भी नहीं सकता था उन दिनों।

कितना अलग था हम लोगों का रहन सहन तब! मेहमान बाहर के टॉयलेट में हाथ मुंह धोकर ही भीतर आते। चप्पल जूते बाहर उतारते। सब हाथ जोड़कर अभिवादन करते, कोई हाथ नहीं मिलाता। भोजन में स्वाद से अधिक शुद्धता पर ज़ोर दिया जाता था। शायद यह संसार अब वापस उन्हीं आदर्शों को अपनाने को मजबूर हो जाएगा जिन्हें इसने तिरस्कृत कर दिया है।

अमेरिका की कुछ पत्रिकाओं और स्वयंसेवी संस्थाओं ने 'वॉलेंटरी सिंप्लीसिटी' नामक एक आंदोलन की शुरुआत की है, जो इसी सोच पर आधारित है कि सुविधाजनक विकल्पों के जाल में उलझने के बजाय हमें सीधी-सरल जीवनशैली अपनानी चाहिए। वहां का शिक्षित वर्ग इसका महत्त्व समझने भी लगा है। क्या हम भारतीय भी अपनी संस्कृति के महत्व को, उसकी बारीकियों को समझ पाएंगे? इस सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ और सबसे उन्नत जीवन शैली को पुनः अपना पाएंगे?

विज्ञान ने हमें बहुत कुछ दिया है। बहुत कुछ और भी देने की क्षमता है विज्ञान में। परन्तु विज्ञान को एक रोबोट की भांति देखा जाना चाहिए। जब तक रोबोट मनुष्य की बात मानता है, तब तक ही वह मनुष्य का हितकारी है, मनुष्य का मित्र है। जिस दिन स्वयं मनुष्य रोबोट के नियंत्रण में हो गया तो मनुष्य जाति की कैसी दुर्गति होगी इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंध के परिप्रेक्ष्य में यह बात नितांत उलटी है। मनुष्य प्रकृति की देन है, प्रकृति का सृजन मनुष्य ने नहीं किया है। जब तक मनुष्य प्रकृति का सम्मान करता है, प्रकृति मनुष्य की रक्षा करती है, उसका लालन पालन करती है। जब मनुष्य प्रकृति को अपने वश में कर उसके प्रति असम्मान के भाव को व्यक्त करता है, प्रकृति मनुष्य को सबक सिखाती है।

विज्ञान, धर्म और संस्कृति अलग अलग नहीं हैं। इनका हाथ में हाथ मिलाकर चलना ही उचित है। वैसे भी, विज्ञान प्रकृति को समझने का एक प्रयास ही तो है। यही उद्देश्य धर्म और अध्यात्म का भी है।

एक अदृश्य वायरस ने पूरी मानव जाति को झिंझोड़ कर रख दिया है। इसकी चुनौती के सामने ज्ञान विज्ञान, धर्म अध्यात्म सब चुप रहने को मजबूर हैं और ईश्वरीय सत्ता के सामने नतमस्तक हैं।

रेडियो पर तो वह गीत कब का समाप्त हो चुका है परन्तु मैंने गूगल पर ढूंढ़कर उसे फिर चालू कर लिया है। आज मुझे इस गीत के रहस्य को सुलझाना है।

पंछी नदिया पवन के झोंके
कोई सरहद ना इन्हें रोके

हमारे महा उपनिषद् में भी तो कहा गया है:

वसुधैव कटुंबकम्

पूरा विश्व एक कुटुम्ब ही तो है। तो फिर ये सरहदें क्यों? क्यों मनुष्य को सीमाओं में बद्ध कर दिया गया है, एक दूसरे से काट दिया गया है?

बहुत देर से लघु शंका का दबाव पड़ रहा था किन्तु इस तपते शरीर को टॉयलेट तक लेे जाना? परन्तु जाना तो पड़ेगा।

बाहर का यह टॉयलेट बहुत समय से प्रयोग में नहीं था। कुछ वर्षों से मेहमान सीधे भीतर के ड्रॉइंगरूम में आते और भीतर के टॉयलेट्स का ही प्रयोग करते। बाहर के टॉयलेट में तो पुताई वालों की बाल्टी, कूंची, ब्रश और कुछ बचे और सूखे हुए पेंट के डब्बे रखे रहते थे। वर्षों से इस टॉयलेट में कब्जा जमाये इस सामान को बेघर कर मेरे उपयोग के लिए टॉयलेट को चालू कर दिया गया था।

इसी बैठक में बिछे तख्त पर, जहां पिताजी बैठकर स्वाध्याय करते, मनन करते और मित्रों के साथ बतियाते, राजनीति से लेकर दर्शनशास्त्र पर चर्चा करते थे, मैं पिछले कई दिनों से लेटा हुआ मैली छत को निहारता रहता हूं, दिन और रात। अब यही 100 वर्गफुट का कमरा मेरी दुनिया है। हद से हद मैं बाहर के टॉयलेट तक जा सकता हूं जहां से निवृत्त होकर मैं लौटा हूं।

मेरा स्मार्टफ़ोन इस कमरे में मेरा एकमात्र साथी है। यह स्मार्टफ़ोन भी कमाल की चीज है। शायद इन दिनों के लिए ही इस अद्भुत यंत्र का आविष्कार हुआ था। एक कमरे में बंद होते हुए भी पूरी दुनिया मानो अपने इशारे पर कमरे में ही आ जाती थी। फ़्री कॉल्स और तेज़ इंटरनेट के सहारे सब प्रियजनों से तार जुड़े हुए हैं।

फिर भी, इस पुराने डिज़ाइन के सादा कमरे की वह छोटी खिड़की जो बाहर गली की ओर खुलती है, बहुत आकृष्ट करती है। खिड़की के बाहर कोई दिखता नहीं, फिर भी निगाहें बरबस उधर ही जाती रहती हैं। जिस तख्त पर मैं बैठता, लेटता और अधलेटी अवस्था में पड़ा रहता हूं, वहां से यह खिड़की मुश्किल से आठ दस फुट की दूरी पर है, फिर भी मैं उस खिड़की के साथ पिताजी की प्रिय कुर्सी को लगाकर खिड़की के बाहर घूम रही हवा को महसूस करता रहता हूं, इंतज़ार करता रहता हूं कि शायद कोई व्यक्ति वहां से गुजरे और मैं उसे चलते हुए देख पाऊं।

एक रोज़ गुज़रा था एक पड़ोसी, मुंह ढककर। हाथ में थैला था। शायद सब्जी लेने जा रहा था। उसे दूर से ही देख सहसा एक मुस्कान आ गई थी मेरे चेहरे पर, परन्तु हाथों ने यंत्रवत खिड़की को बंद कर दिया। उसके बाद से खिड़की के पास बैठकर मानो मैं यही इंतज़ार करता रहता हूं कि कोई वहां से गुजरे और मैं खिड़की को बंद कर दूं।

सरहदें इन्सानों के लिए हैं...

सरहदें हैं तो जानवरों के लिए भी। फर्क सिर्फ़ इतना है कि उन्हें इनका भान नहीं है।

इन्हीं लॉकआउट के दिनों में एक तेंदुआ इन्सानों की सरहद में घुस आया था। कई इन्सान जख्मी हुए और तेंदुआ भी।

यह कोरोना की बीमारी भी तो इसीलिए आई कि इन्सान अपनी सरहद भूल गया था। खाद्य और अखाद्य में भेद भूल गया। पहले प्राणियों को खाना प्रारंभ किया और फिर कुत्ता, बिल्ली, सांप, टिलचिट्टे, चमगादड़ - सब खाने लगा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि इन्सान को अपनी सीमा लांघने का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा है। परन्तु इन्सान की कभी खत्म न होने वाली भूख उसे सीखने ही नहीं देती और वह बार बार अपनी सीमा लांघना चाहता है।

हो सकता है इस कोरोना वायरस का सीधा संबंध चमगादड़ों से न हो। हो सकता है इसे वुहान की लेबोरेटरी में बनाया गया हो। हो सकता है इसका कोई और ही स्रोत हो। जो भी हो, इसका सम्बन्ध इन्सान द्वारा अपनी सीमा लांघने से अवश्य है।

सरहदें इन्सानों के लिए हैं
सोचो तुमने और मैंने क्या पाया
इन्सां हो के ...

परन्तु यदि सोचने से ज़िन्दगी बदल सकती तो इन्सान से पहले बकरा सोचता कि उसने क्या पाया बकरा बनके? इन्सान का छुरा पाया? इन्सान की भूख का शिकार बनने को? इन्सान से पहले भैंसा सोचता, मुर्गा सोचता, सूअर सोचता, आसमान में उड़ने वाला वह पंछी सोचता। सबको तो इन्सान निगल जाता है। अब तो कोई भी जानवर सुरक्षित नहीं रहा, इन्सान की लपलपाती ज़ुबान के सामने।

वसुधैव कटुंबकम्।

क्या इस वसुधा में वह तेंदुआ शामिल नहीं है जो अपनी सरहद लांघ कर मनुष्य की सीमा में घुस आया था? क्या इस वसुधा में वे पशु पक्षी नहीं हैं जिन्हें अपनी जिह्वा की तुष्टि के लिए मनुष्य मार कर खा जाता है?

श्रीमती जी मेरे साथ मेरे कमरे में आना चाहती थीं, मेरी देखभाल के लिए। "इस बीमारी के समय इन्हें अकेला कैसे छोड़ दूं," उनका तर्क था। पिछले चालीस साल के विवाहित जीवन में, उंगलियों पर गिने जा सकें, इतने ही दिन रहे होंगे जब उन्होंने मुझे अकेला छोड़ा हो। अपने मायके भी जातीं तो मेरी खातिर अगले ही दिन वापस आ जातीं। बीमारी में अकेला छोड़ने का तो प्रश्न ही नहीं था।

कोविड 19 वायरस की बात कुछ और है। यह बीमारी कम और डर अधिक है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि इस बीमारी से मरने वालों की संख्या अधिक नहीं है। मात्र दो से पांच प्रतिशत रोगियों को ही यह रोग काल के मुख में धकेलता है। अन्य रोगी प्रायः ठीक हो जाते हैं इस लाइलाज बीमारी से। मरने वालों में अधिकांश 60 वर्ष से अधिक आयु के होते हैं, या फिर किसी लंबी अथवा गंभीर बीमारी जैसे मधुमेह अथवा कैंसर आदि से ग्रस्त व्यक्ति।

आम तौर पर हर दूसरे घर में साठ वर्ष से ऊपर की आयु का कोई तो व्यक्ति होता ही है। और हर दूसरे घर में कोई गंभीर बीमारी वाला भी। इसलिए हर घर में मौत की परछाईं अनुभव की जाती है। हर वयोवृद्ध व्यक्ति की तस्वीर पर माला डालने का समय आ गया, ऐसा महसूस किया जाता है।

जिन्हें हम आज सीनियर सिटिज़न के नाम से जानते हैं, हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वह वानप्रस्थाश्रम कहलाता है, जब मनुष्य ईश्वर की उपासना की ओर गतिबद्ध हो जाता है और अपने सांसारिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करता है। उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार में रहते हुए भी परिवार से दूरी बनाकर रखे और ईश्वर साधना एवं सामाजिक क्रियाकलापों में संलग्न रहे।

जब व्यक्ति अपने मोहपाश में बंधकर अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता तो प्रकृति उसे विवश कर देती है। परिवार से दूरी बनाने का समय आ गया था। साधना एवं ध्यान के लिए पर्याप्त समय मिलने वाला था। बच गए तो समाज के ऋणों से मुक्त होने का संकल्प भी आ रहा था मन में।

आशा ने अभी तक साथ नहीं छोड़ा है। मनुष्य के पास जब कोई उपाय नहीं बचता है तो वह आशा नाम के उपाय को गढ़ लेता है।

मधुमेह का रोग व्यक्ति को सभी चिकित्सा पद्धतियों का जानकार बना देता है। तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और विटामिन सी तो मैंने तभी लेना शुरू कर दिया था, जब तबलीगी जमात वाले डॉक्टरों का मखौल उड़ा रहे थे और मस्जिद में नमाज़ पढ़ते रहने पर अड़े हुए थे।

अलबत्ता, जमात की ताक़त का मुझे तब अंदाज़ा नहीं था। नहीं जानता था कि यह जमात मुझे भी संक्रमित कर सकती है, जबकि मेरा उससे कोई वास्ता ही नहीं था। बचपन में यही समझ में आया था कि जमात का अर्थ होता है कक्षा, जब कुछ बड़े पूछ लिया करते थे, "बेटा, कौन सी जमात में पढ़ते हो?" इससे अधिक जमात के बारे में मैं कुछ नहीं जानता था। मरकज़ में भी जमात लगती है, मुझे नहीं मालूम था।

मरकज़ के जमातियों ने किस क़दर सर में दर्द कर रखा था प्रशासन के, पुलिस के और स्वास्थ्यकर्मियों के, टीवी पर यह देख देख कर दुख होता था। क्या लाभ किसी भी जमात की किसी भी पढ़ाई का, यदि व्यक्ति अपने हित अहित में भेद भी न कर पाए! और कैसे कोई मनुष्य जानबूझकर अपने साथ औरों के प्राण भी संकट में डाल सकता है!

प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन घोषित करने से भी पहले हमारे परिवार ने स्वयं को अपने घर में बंद कर लिया था। तो मैंने कहां से पाया यह संक्रमण? पक्का तो कौन कह सकता है! पर लगता है राशन की या सब्ज़ी की दूकान से आया होगा। हो गई होगी कोई असावधानी खरीदारी करते समय! मोहल्ले में एक और व्यक्ति भी पीड़ित है इस रोग से। सुना है, उसका मिलना जुलना है तबलीगी जमात के लोगों से। सच तो शायद पुलिस को ही मालूम हो।

मेरे सामने अब दो चुनौतियां थीं, स्वयं को रोगमुक्त करना, जिसका कोई निश्चित उपाय नहीं था और यह सुनिश्चित करना कि मेरे कारण कोई और व्यक्ति संक्रमित न हो। इसी हेतु पिताजी की बैठक काम आ रही थी। इस रोग में रोगी का कमरा हवादार होना चाहिए और यह कमरा इस कसौटी पर खरा उतरता है।

बड़ी कठिनाई से पत्नी को मनाया। समझाया कि छूत के इस रोग से वह भी बीमार हो गईं तो क्या होगा? बच्चों को इस रोग से दूर रखने के लिए यह आवश्यक था कि वह मुझसे दूरी बना कर रखतीं। अंततः वह मान गईं। किसी भी मां को उसके बच्चों के नाम से किसी भी कार्य के लिए राज़ी किया जा सकता है।

मेरे और मेरे परिवार के बीच एक दरवाज़ा था जो सरहद थी, मेरे और उनके बीच, वायरस और स्वास्थ्य के बीच। इस सरहद का हम सबको सम्मान करना था, जीवन को बचाने के लिए।

शायरों के लिए कितना आसान होता है न, उस सरहद का उपहास उड़ाना जिसकी सुरक्षा के लिए हमारे देश के जवान कठिन से कठिन परिस्थितियों में जान की बाज़ी लगाते हैं। उनके त्याग और बलिदान के कर्जदार हैं हम, जो सरहद के भीतर आज़ादी की सांस ले पाते हैं।

पंछी नदिया पवन के झोंके
कोई सरहद ना इन्हें रोके।

वह सरहद ही तो है जहां जवान के सीने दुश्मन की गोली को रोककर उसे हम तक नहीं पहुंचने देते; जहां वह गोली का जवाब गोली से देकर हमारी सुरक्षा करते हैं।

दरवाज़े रूपी सरहद के उस पार से मेरा परिवार मेरे लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था और इस पार से मैं उन सबके लिए। जब भी उधर से मेरी कुशल क्षेम पूछी जाती, एक फौजी की भांति मेरा एक ही उत्तर होता, "ठीक है।"

परन्तु सब ठीक नहीं था।

पहले दिन से ही मेरा गला पका हुआ था, सूखी खांसी आ रही थी, नाक सूखी हुई थी और हलका ज्वर था।

मैं नहीं चाहता था कि मेरी पत्नी भावावेश में अपनी सरहद को लांघ कर मेरे कमरे में आए। इसलिए मैं उन्हें अपनी तबीयत के बारे में झूठ बताता रहा। सारे लक्षण कोविड 19 के थे, जिसका इलाज था स्वयं को सबसे अलग कर लक्षणों की रोकथाम करना। मरीजों से पटे अस्पताल में जाकर उनका बोझ बढ़ाने का कोई औचित्य न था, विशेषकर जब कोई इलाज ही नहीं था इस बीमारी का। वैसे भी, मधुमेह से पीड़ित होने के कारण भोजन आदि का विशेष ख्याल रखना आवश्यक था जो महामारी के चलते अस्पताल में हो पाना कठिन था। इसलिए हमने निर्णय लिया कि घर में ही रहकर सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार उपचार किया जाए।

पत्नी समय पर दरवाज़ा थोड़ा खोलकर भोजन आदि भीतर सरका दिया करती। साथ ही दिन में दो बार श्वासारी क्वाथ भी उबाल कर नियमित रूप से देती थीं। तुलसी, गिलोय और अश्वगंधा का सेवन तो बीमारी के पहले से ही जारी था।

दिन प्रतिदिन ज्वर बढ़ता जा रहा था और बदन में असहनीय पीड़ा थी। ज्वर कम करने के लिए तो मैं एलोपैथिक दवा लेे रहा था। आवश्यक था कि साथ में ठंडे पानी की पट्टियां भी होती। चूंकि मैं परिवार से ज्वर तेज़ होने की बात छुपा रहा था, इसलिए कमरे में ठंडे जल या बरफ की व्यवस्था नहीं हो सकती थी। सादे जल की पट्टियां मैं स्वयं कर रहा था किन्तु वे उतनी प्रभावी नहीं थीं।

रात को योगनिद्रा के सहारे मैं कुछ घंटों की नींद ले पाता था। दिन में जब बन पड़ता, प्राणायाम करता।

फिर भी मेरी अवस्था बिगड़ती जा रही थी। ज्वर कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

पांच छह दिन हो चुके थे। प्रतीक्षा थी चार पांच दिन और बीतने की जिसके बाद सुधार की आशा थी। परन्तु अब मुझे श्वास लेने में भी कठिनाई होने लग गई। रात होते होते लगा कि अब श्वास नहीं लिया जा सकेगा। हार कर मैंने अपने पारिवारिक डॉक्टर को फ़ोन लगाया। मेरी स्थिति की जानकारी लेकर उन्होंने सरकारी अस्पताल के डॉक्टर से बात की और मुझे सूचित किया कि संभवतः मुझे वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ेगी जिसके लिए मुझे अगले रोज़ अस्पताल में भरती होना ही पड़ेगा।

फ़ोन काटने के बाद मुझे लगा कि शायद मैं वेंटिलेटर पर जाने से पहले ही कूच कर जाऊंगा।

योग की कक्षाओं में सीखी कुंजल क्रिया का स्मरण आया। कमरे में बिजली की एक केतली रखी थी। पहले दिन से ही मैं गर्म पानी का सेवन ही कर रहा था। सुना था, यह वायरस गर्मी से मर जाता है। उस रात मैं पानी गर्म करता गया और नमक डाल कर छह सात गिलास गर्म पानी पी गया। फिर बहुत कठिनाई से टॉयलेट तक गया और पिया हुआ सारा पानी बाहर उड़ेल दिया। साथ ही, ऐसा लगा, शरीर में जमा विष भी निकल गया हो। वापस तख्त पर आ निढाल होकर लेट गया। दो तीन घंटे बाद नींद खुली तो ज्वर लगभग सामान्य था। दो या तीन दिन के बाद ज्वर टूटा था। अब मुझे श्वास लेने में भी कोई कठिनाई नहीं थी।

योगनिद्रा की सहायता से रात भर सोया रहा। सुबह उठते ही डॉक्टर को फ़ोन लगाकर अपने स्वास्थ्य की सूचना दी और उनसे अनुरोध कर अस्पताल जाने के कार्यक्रम को रद्द कराया।

लगता तो यही है कि खतरा टल गया है। परिवार और मेरे बीच बनी सरहद का उल्लंघन हममें से किसी ने नहीं किया है। अब तक परिवार स्वस्थ है जिससे लगता तो यही है कि सरहद का सम्मान करने से मेरा परिवार बच गया है।

सरहद इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण है तो वसुधैव कुटुम्बकम् मंत्र का क्या?

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् |

अर्थात उदार मन वालों के लिए यह पूरी धरा एक परिवार के समान है। तेरा-मेरा तो संकुचित मन वाले करते हैं।

तो इन सरहदों के साथ इस धरा का बंटवारा क्यों?

क्या यह धरा स्वयं बंटवारा नहीं करती? कल्पना कीजिए कि इस धरा पर जल और थल के बीच में सरहद न हो! एक हो जाएं जल और थल! कल्पना कीजिए कितना भयावह होगा यह दृश्य! इसे ही तो हम प्रलय के नाम से जानते हैं। जब तक जल और थल के बीच सरहद है, तब तक ही यह जीवन है।

और क्या यह धरा हमें इस रोग के माध्यम से यह संदेश नहीं दे रही कि हम सब अपनी मर्यादा में रहें? स्वेच्छा से तो हम ऐसा करते नहीं। इसलिए प्रकृति हमें मजबूर कर रही है अपनी मर्यादा को समझने के लिए, उसका सम्मान करने के लिए। और देखो आज प्रकृति कितनी प्रसन्न है! पक्षी चहचहा रहे हैं, नदियों का जल निर्मल हो गया है, आकाश नीला हो गया है, सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से पर्वतश्रृंखलाएं दिख रही हैं!

विगत दो दशकों में विश्व में उदारीकरण का दौर चला। हमने देखा कि विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस उदारीकरण से सभी अर्थव्यवस्थाओं को लाभ भी हुआ। और इससे उपजी वैश्विक गांव की अवधारणा। यदि ऐसा हो सके तो यह एक आदर्श स्थिति होगी।

परन्तु क्या यह संभव है, व्यावहारिक है? अब तो यूरोपीय संघ भी विघटित हो चला है। भाषा, खानपान, परंपरा और सांस्कृतिक भिन्नता इस अवधारणा पर भारी है।

वायरस की इस समस्या से जनित इस परिस्थिति से अपेक्षित तो यह था कि पूरा विश्व एक हो जाता और मानवजाति पर आई इस विपदा का मिलकर सामना करता। परन्तु क्या ऐसा हुआ? हुआ इसके ठीक विपरीत। इस समस्या ने पूरे विश्व को दो फाड़ कर दिया। चीन का विरोध करने में तो अमेरिका और प्रायः सभी यूरोपीय देश एक दिखते हैं परन्तु अपने अंतर्निहित स्वार्थों के चलते वे सब अलग हैं।

वैश्विक गांव की अवधारणा उतनी ही अव्यावहारिक है जितना मनुष्य का पंछी अथवा पवन बनकर उड़ना। संस्कृति ही हमारे जीवन को आधार देती है। विभिन्न संस्कृतियों का समन्वय तो संभव है, और बहुत हद तक वांछित भी, परन्तु सब संस्कृतियां स्वयं को समाप्त कर किसी एक संस्कृति में विलुप्त हो जाएं, यह संभव नहीं। सरहदें दिलों को बांटें, जैसा कि किसी भी साम्राज्यवाद में होता है, उससे तो बेहतर हैं राजनैतिक सरहदें, भौतिक सरहदें।

मेरे कमरे का वह दरवाज़ा जिसके पार मेरा परिवार है, उसकी रक्षा के लिए ही तो इसे सरहद बनाया है हमने! यह सरहद कुटुम्ब की रक्षा करती है, इसका बंटवारा नहीं। सीमाएं मर्यादा सुनिश्चित करती हैं। कुटुम्ब हो या विश्व, यह टूटता तब है जब इन मर्यादाओं को तोड़ा जाता है। मर्यादाएं रिश्तों की हों या भौतिक, राजनैतिक हों अथवा प्राकृतिक, इनका सम्मान करना ही श्रेयस्कर है, इनकी रक्षा करने में ही मनुष्यमात्र की सुरक्षा है।

कल अस्पताल जाना है। टेस्ट करवाकर पता लगाना है कि मैं अभी कोरोनामुक्त हुआ कि नहीं।

कल यदि अनुकूल रिपोर्ट आ भी गई तो क्या जीवन पहले जैसा हो पाएगा? शायद नहीं। प्रकृति स्वयं अपना परिसीमन बदलती रहती है। सुना है, हिमालय भी अपने स्थान से हिलता रहता है। 'पहले जैसे' से इतना मोह क्यों? वसंत ऋतु के बाद ग्रीष्म ऋतु आती है, फिर वर्षा ऋतु, उसके बाद शरद ऋतु, हेमंत ऋतु, शिशिर ऋतु और उसके बाद पुनः वसंत ऋतु। यही तो नियम है प्रकृति का।

छोटी खिड़की के पार कुछ परछाइयां हिलती दिख रही हैं। मुंह पर रूमाल रखकर दूसरी ओर देखने का समय आ गया है।


Monday, March 5, 2018

गुंडे-मवाली


एक दिन मैं अपनी गली की एक दूकान पर खड़ा कुछ सामान ले रहा था. एक युवक वहाँ आकर रुका. बिखरे बाल. सीने के बटन खुले हुए. गुंडे-मवालियों जैसा अंदाज़. वह एक अन्य युवक को धमका रहा था. अचानक उसकी नज़रें मुझसे मिलीं. वह कुछ अचकचा-सा गया और अपनी बात को संक्षेप में समाप्त कर दूसरे युवक को गाली देकर चला गया. मुझे उसका चेहरा परिचित सा लगा किन्तु स्मरण नहीं आया कि वह कौन था और मुझे देखकर असहज क्यों हो गया था.

उस घटना के बाद वह युवक मुझे अकसर गली में दिखने लगा. खुले बटन. लोफरों वाला अंदाज़. पास से गुज़रता तो पता नहीं क्यों दिल करता कि मैं उसे रोक कर उससे बात करूं. उसे कुछ सलाह दूं. किन्तु वह युवक मेरे प्रति उदासीन, सीना फुलाए कमीज़ के कालर उठाये, पास से गुज़र जाता. 

एक दिन रात को सोने से पहले मैं उसके बारे में सोच रहा था. यकायक मुझे उस युवक का स्मरण हो आया. यह तो वही युवक था, जो मुझे जब भी मिलता, बहुत सम्मान के साथ मुझे नमस्कार किया करता था. कारण? एक बार कुछ दिनों तक परीक्षा के दिनों में मैंने गली के कुछ युवा छात्रों की पढ़ने में सहायता की थी. उन युवाओं में एक वह भी था.

पढ़ाई के दौरान वह अधिक उत्साह नहीं दिखाता था. चुपचाप बैठा रहता था. संभवतः वह अपने परिणाम को लेकर अधिक आशावान नहीं था. समयाभाव के कारण मैं भी उसकी पढ़ाई में अलग से कोई रूचि नहीं ले पाया था. पता नहीं, वह पास भी हुआ था कि नहीं, मुझे इसकी जानकारी भी नहीं मिली. बस उसका और मेरा इतना ही सम्बन्ध था कि वह मुझे सम्मान के साथ नमस्ते करता और मैं मुस्कुरा कर उसे उत्तर देता. वर्षों बीत गए. वह युवक अब दिखाई नहीं देता था. मैं भी उसे भूल चुका था. 

जो हमेशा झुक कर सम्मानपूर्वक अभिवादन किया करता था, उसमें इतना बदलाव! चेहरा वही, फिर भी इतना अलग व्यक्तित्त्व! अब मुझे समझ आया कि क्यों वह चेहरा मुझे इतना आकृष्ट करता था; क्यों मैं उसके बारे में इतना सोचता था.

अगली बार जब मुझे वह दिखा तो मैंने उसे बुला लिया. उसके लिए यह अप्रत्याशित था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मुझसे कैसे व्यवहार करे. उसकी छवि एक गुंडे-मवाली की थी किन्तु मुझसे बात करते समय उसे अपना पुराना स्वरूप स्मरण हो रहा था और वह इस ऊहापोह से निकल नहीं पा रहा था. मेरे बुलाने पर उसने मुझे अभिवादन तो किया किन्तु उसमें पहले जैसा सम्मान नहीं था. अकड़ थी. 

थोड़ी बातचीत के बाद वह संयत हुआ. मैंने उसे अपने घर चलने को कहा. मेरे इस प्रस्ताव पर पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं उस गुंडे को अपने घर चलने के लिए कह रहा था. 

घर पहुँचने पर मेरे सामने वही वर्षों पहले वाला नवयुवक बैठा था. राकेश नाम था उसका. मासूम. झुकी हुई आँखों में नमी. दो-चार मिनटों की बातचीत के बाद वह रो रहा था – बच्चों की तरह. आज कहूं तो उसकी कहानी एक घिसी-पिटी फ़िल्मी कहानी की भाँति थी. किन्तु मैं स्वयं उसकी कहानी का साक्ष्य था. बस इतना नहीं, मैं जानता था कि वह नवयुवक भी उस कहानी का एक प्रमुख पात्र था.

हमारी गली का वातावरण बहुत तनावपूर्ण था उस दिन. पूरी गली वर्दीधारी पुलिस वालों से भरी हुई थी. सुनने में आया, कुछ गुंडे फ़ौजदारी करके छुपे हुए थे किसी घर में. सब लोग अपने-अपने घरों में सहमे हुए दुबके थे. घर-घर की तलाशी ले रही थी पुलिस. खबरों-अफ़वाहों का बाज़ार गरम था. बैंक डकैती से लेकर एक बड़े नेता की ह्त्या तक की अफ़वाहें थीं. किसी छोटी-मोटी वारदात से तो पुलिस हरकत में आती नहीं.

एक खबर जिसकी बाद में पुष्टि भी हुई, यह थी कि युवकों के दो गुटों में झगड़ा हो गया था. बात बिगड़ गयी और एक युवक का सर फूट गया. संयोग से जिस युवक का सर फूटा था, वह एक पुलिस अधिकारी का पुत्र था. अब पुलिस दूसरे गुट के एक-एक युवक को चुन-चुन कर पकड़ रही थी, उन्हें प्रताड़ित कर रही थी.

थोड़ी देर में खबर आयी कि गली के एक घर में कुछ युवक सचमुच छुपे हुए थे और पकड़े गये थे. उन युवकों में एक राकेश भी था, इसकी जानकारी मुझे नहीं थी.

“पुलिस ने हमें बहुत पीटा, थाने में. तब तक, जब तक हम उनके लगाए सभी आरोपों को मान नहीं गये – चाहे वे सच्चे थे अथवा मनगढ़ंत. हम पर पैसे लूटने, चोरी करने और चाकू से हमला करने जैसे आरोप लगाये गये. हमने उस लड़के को मारा ज़रूर था, किन्तु मारा तो उन्होंने भी था हमें. हममें से एक लड़के ने, जो बहुत पिट रहा था, पत्थर उठाकर दे मारा एक लड़के के सर, और उसके सर से खून निकलने लगा. चाकू को तो हमने कभी हाथ भी नहीं लगाया था, सिवाय सब्ज़ी काटने वाले चाकू के,” राकेश रोते-रोते बता रहा था अपनी आपबीती.

“अदालत में खून लगा चाकू भी था और अनेक गवाह भी. हमें सज़ा हो गयी – उस अपराध के लिए, जो हमने नहीं किया था.

“जेल में हमें कई तरह के लोग मिले. गुंडे-मवालियों से लेकर वर्दी-वाले गुंडे. सबने वहां हमसे दुर्व्यवहार किया.

“जेल से बाहर आकर हम सामान्य जीवन जी सकें, इसका सवाल ही नहीं है. कोई हमसे सीधे-मुँह बात ही नहीं करता. घर में भी नहीं. घर में तो सब मुझे गुंडा-मवाली कहते हैं. कॉलेज जाने की आयु रही नहीं. काम कोई देता नहीं. सिर्फ़ गुन्डागर्दी की ट्रेनिंग है हमें. तो गुंडा-मवाली बनने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं रहा,” शून्य में ताकता हुआ बोल रहा था वह.   

राकेश कसम खा कर कह रहा था कि जिन अपराधों की सज़ा उसे मिली थी और जेल से बाहर आकर भी मिल रही थी, उनमें से कोई भी अपराध उसने नहीं किया था. मुझे उसकी आँखों में सच्चाई दिख रही थी. मुझसे झूठ बोलने का कोई कारण भी नहीं था.

अब मेरी नज़रें झुकी हुई थीं. साहस नहीं हो रहा था उसकी ओर देखने का. कौन था ज़िम्मेदार उसकी इस त्रासदी का? वह स्वयं, जो पढ़ाई के स्थान पर आवारागर्दी करता था? पुलिस वाले, जिन्होंने उसे अपराधी बनाया? उसके परिवारवाले, जिन्होंने उसे आवारागर्द बनने दिया? शिक्षा-व्यवस्था? या समाज जो अपराधी का ठप्पा लगे व्यक्ति से या तो डरता है या नफ़रत करता है. उसे अपनाता नहीं.


Wednesday, February 28, 2018

मानवाधिकार


किशोरावस्था थी उस समय मेरी. घर के बगल वाले खाली प्लाट पर खेल रहे थे हम. शाम होने वाली थी. अचानक गली में से एक साइकिल रिक्शा बहुत तेज़ गति से निकली. तेज़ शोर के साथ उसके पीछे तीन-चार रिक्शा और निकलीं, उतनी ही तेज़ गति से. हम सकपका कर गली में आये. रिक्शाएं जा चुकी थीं. गली में कई लोग ऐसे ही मुँह बाए खड़े थे. किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था.

इतने में किसी बच्चे की माँ वहां आयी और अपने बच्चे को पकड़ कर ले चली. अन्य बच्चों को भी हिदायत दी कि सब बच्चे अपने-अपने घर चले जाएँ, तुरन्त. पुलिस कुछ गुंडों का पीछा कर रही थी. बाहर रहना खतरे से खाली नहीं था.

हम भागकर अपनी छत पर चढ़ गये. इतने में वही साइकिल रिक्शा फिर दिखाई दी. पहली रिक्शा में दो कसे बदन के दो युवा बैठे हुए हंस रहे थे और पीछे एक के बाद एक चार रिक्शाओं में दो-दो पुलिस के जवान लाठियां लिए बैठे थे.

इन रिक्शाओं ने गली के तीन-चार चक्कर लगाए, थोड़ी-थोड़ी देर के बाद. लगता था पूरे मोहल्ले के चक्कर लगा रही थीं ये रिक्शाएं. अत्यंत उत्तेजक एवं लोमहर्षक दृश्य था. देखते ही देखते सांझ का झुटपुटा हो गया. हम इन्तज़ार कर रहे थे, रिक्शाओं के एक और चक्कर का, परन्तु खेल अब समाप्त हो गया था.

इसके आगे की कहानी किसी साथी ने अगली सुबह बतायी. पुलिस को पूरे मोहल्ले के कई चक्कर लगवाने के बाद सांझ होने पर गुंडे भागकर खेतों में घुस गये. पीछे-पीछे पुलिस भी चली गयी, अति-उत्साह में. वहां गुंडों ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. लाठीधारी पुलिस वाले जान बचाकर भागे घने खेतों की ओर, और वहां दुबक कर छुप गये. गुंडे अट्टहास करते हुए वहां से चले गये और पुलिस वाले जान बचाकर वहीं दुबके रहे खड़ी फसल में. देर रात थाने से पुलिस का एक और दस्ता आया टॉर्चों के साथ, और ढूंढ-ढूंढ कर अपने साथियों को निकाल कर साथ ले गया.

बहुत थू-थू हुई पुलिस की हर तरफ़. चले थे गुंडों को पकड़ने! कायरों की तरह अंधेरी झाड़ियों में दुबके रहे डरकर! और भी बहुत कुछ. जैसे, पुलिस वाले तो गुंडों से मिले हुए होते हैं। यह पीछा-वीछा तो सब दिखावटी है! डंडे लेकर चले थे पिस्तौल-धारी गुंडों को पकड़ने? क्या इन्हें मालूम नहीं था कि गुंडों के पास कौन से हथियार थे? पुलिस वाले होते ही डरपोक हैं. घूस खा-खाकर मानसिक रूप से और हरामखोरी करके शारीरिक रूप से कमजोर हो जाते हैं. इन पुलिस वालों का बस तो सिर्फ़ शरीफ़ लोगों पर चलता है, गुंडे-मवालियों से तो डरते हैं ये! जितने मुँह, उतनी बातें.

इस घटना के कुछ दिनों बाद हम मकान बदल कर दूसरे मोहल्ले में चले गये. बालक-मन भूल गया उस वारदात को.

कई वर्षों बाद उसी इलाके में जाना हुआ. बचपन के दोस्तों की एक मंडली में हम घूम रहे थे यूं ही. एक दोस्त ने पूछा, “चाय पी जाए?” सबने हामी भरी. “चलो थाने चलते हैं चाय पीने.” मुझे कुछ अजीब लगा, थाने में चाय? मित्र ने बताया, “यार, रज्जो की चाय बहुत बढ़िया होती है, यहीं थाने के गेट पर दूकान है उसकी.”

नाम सुना-सुना सा लग रहा था. दुकानदार को देखकर बहुत तरस आ रहा था. पूरा शरीर मानो मुड़ा-तुड़ा हो. लगता था जैसे चाय अब छूटी उसके हाथ से. परन्तु धीरे-धीरे ही सही, वह चायवाला रज्जो अदरक, इलायची कूट कर बड़े सलीके से चाय बना रहा था. चाय वाकई बहुत स्वादिष्ट थी.

रज्जो को देखकर श्रद्धा-सी उमड़ रही थी. उसकी स्वावलंबन की भावना अतुल्य थी. ऐसे शरीर के साथ भी कोई काम कर सकता है, हृदय रुदन कर रहा था.

वहां से चलने पर बातचीत का विषय था रज्जो. “भगवान् भी कैसे-कैसे अत्याचार करता है बेबस लोगों पर,” मैं अनायास कह गया.

“मालूम है कौन है रज्जो?” बचपन में मेरे साथ उस खाली प्लाट में खेलने वाले उस मित्र ने पूछा. मुझे कैसे मालूम होता! “याद है, बचपन में एक दिन एक गुंडे ने पुलिस को खूब चक्कर खिलाये थे मोहल्ले के, और खेतों में ले जाकर गोलियां चलाकर भगा दिया था पुलिस वालों को? फिर आधी रात को पुलिस वालों ने ढूंढा था अपने साथियों को?” एक चलचित्र की भांति पूरा घटनाक्रम मेरी आँखों के सामने से गुज़र गया.

“यह रज्जो ही था वह गुंडा.”

“फिर यह सब कैसे?” मैंने पूछा.

“उस वारदात के बाद कई मुठभेड़ें हुईं पुलिस और रज्जो के गिरोह के बीच में. हर बार रज्जो हावी रहा पुलिस पर और पुलिस गिरफ़्तार नहीं कर पायी रज्जो को. बाद में तो रज्जो का गिरोह बहुत बड़ा और ताकतवर हो गया था. कई बार पुलिस वाले पिटे भी गुंडों से.

“आखिरकार पुलिस का भी दिन आया. पुलिस और रज्जो गिरोह के बीच बहुत लम्बी चली वह मुठभेड़. इस बार पुलिस फ़ोर्स अधिक थी. खूब तोड़ा पुलिस ने पूरे गिरोह को. उसी मुठभेड़ में रज्जो के शरीर की हड्डियों के कई टुकड़े हो गये. किसी लायक नहीं रहा रज्जो. हाथ-पैर सब बेकार हो गये.

“मानवाधिकार आयोग से पुलिस को नोटिस वगैरह भी आये थे; जांच भी हुई थी; परन्तु रज्जो ने पुलिस के पक्ष में बयान दिया था, अपने अपराध और पुलिस पर आक्रमण की बात स्वीकार कर."

"मानवाधिकार वाले रज्जो की ज़िंदगी तो नहीं सुधार सकते थे न.”

“जिन पुलिस वालों ने उसका यह हाल किया था, उन्होंने ही इसे यहाँ थाने के गेट पर जगह दे दी, चाय की छोटी सी दूकान लगाने के लिए - तरस खाकर. तब से रज्जो शराफ़त और मेहनत से काम करता है, पुलिस वालों और बाहर से आने वालों को चाय पिलाता है और अच्छी चाय के लिए मशहूर है. आने वाले अपराधियों को अपना टूटा हुआ शरीर दिखा कर सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है.”

मैं पीछे मुड़कर देख रहा था. रज्जो की दुकान तो ओझल हो गयी थी नज़रों से, किन्तु साइकिल-रिक्शा पर बैठा घमंड से हंसता हुआ वह रज्जो दिख रहा था मुझे.

नज़दीक से
- विक्रम शर्मा


Saturday, February 24, 2018

जेबकतरे

मुम्बई में मेरी पोस्टिंग तो बहुत कम समय के लिए हुई थी परन्तु वह शहर कम समय में ही बहुत कुछ सिखा जाता है.

वर्षों पुरानी बात है. तीन महीने के लिए ट्रेनिंग के लिए मुम्बई में मेरी पोस्टिंग हुई थी एक बैंक की मुम्बई फ़ोर्ट की एक शाखा में. फ़ोर्ट-क्षेत्र में ही मेरे बैच के कुछ अन्य साथी भी कार्यरत थे, विभिन्न शाखाओं में. लगभग रोज़ शाम को हम चौपाटी पर इकट्ठे होते और मरीन ड्राइव अथवा आसपास कुछ समय बिता कर अपने-अपने स्थानीय निवास की ओर रवाना हो जाते.

मैं कांदीवली में ठहरा हुआ था. मेरे साथी मेरे साथ ही चर्चगेट से लोकल पकड़ा करते और रास्ते में अपने-अपने गंतव्य पर उतरते जाते. कांदीवली स्टेशन सबसे बाद में आता, जहां मैं उतरा करता था.

उस शाम मेरे सभी साथी बान्द्रा स्टेशन पर ही उतर गये थे – देर रात का कोई कार्यक्रम बनाकर. मैंने वहां उतरने के स्थान पर सीधे घर जाना ठीक समझा था.

बान्द्रा स्टेशन पर उनके उतरने के बाद जैसे ही ट्रेन चली, कम्पार्टमेंट के दरवाज़े से कुछ आवाजें आने लगीं. कोई झगड़ा हो रहा था शायद. मैं भीतर बैठा था कम्पार्टमेंट के बीचोबीच. देर शाम को दफ़्तर से चलो तो दादर, बान्द्रा आते-आते सीट मिल जाया करती थी उन दिनों. ट्रेन आगे बढ़ती रही, कम्पार्टमेंट खाली होता रहा और आवाजें बढ़ती गयीं. “कोई जेबकतरा पकड़ा गया है. लोग धुनाई कर रहे हैं,’ यात्रियों में से किसी ने खबर दी.

मुम्बई लोकल के दैनिक-यात्री किसी से मन से नफ़रत करते हैं तो वह हैं मुम्बई के जेबकतरे.

एक बार बैंक की शाखा में दोपहर के भोजन के समय बातचीत ने मुम्बई के जेबकतरों की समस्या का रुख कर लिया.

एक सज्जन बता रहे थे कि किस प्रकार विरार से चर्चगेट के बीच चलने वाली डबल फ़ास्ट ट्रेन में एक बार एक जेबकतरा पकड़ा गया. लोगों ने उसे घंटा भर जी भरकर पीटा. इतना पीटा कि उसके कपड़े फट गये. और अंत में उसे चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया.

“च्च्च...” मेरे मुँह से अनायास निकला. “इतने निर्दयी लोग,” मैं सोच रहा था.

मेरी यह स्वाभाविक प्रतिक्रिया मुम्बई के निवासी कर्मचारियों को रास नहीं आयी, यह उनके चेहरों से स्पष्ट था. मेरे लिए हैरानी की बात यह थी कि मेरी इस प्रतिकृया पर सबसे अधिक आपत्ति की एक महिला कर्मचारी ने. वह भी आवेशपूर्वक, “क्या च्च्च... और कैसा बरताव होना चाहिए इन जानवरों के साथ? एक भला आदमी पूरे महीने काम करता है, अपने बीवी-बच्चों के लिए, परिवार के लिए, उनकी छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी करने के लिए! और यह जेबकतरा आकर उसकी पूरे महीने की महीने की कमाई पल भर में उड़ाकर ले जाता है! यह ठीक है? उस कमाई के घर न आने से उसके निर्दोष और बीमार माता-पिता का इलाज नहीं हो पाता और वे मर जाते हैं, वह ठीक है?”

मुझे काटो तो खून नहीं. इतने आवेश में उन महिला को देखकर मैं सकपका गया था. उत्तर ढूँढने और देने का प्रश्न ही नहीं था.

मैं समझ गया कि आज भी ऐसा ही कुछ होने वाला था, मेरे ही कम्पार्टमेंट में. “पता नहीं, ये कुंठित भीड़ इस जेबकतरे को ज़िंदा छोड़ेगी या फिर चलती ट्रेन से फेंक देगी...,” मैं सोच रहा था.

अपने कार्यालय के उस महिला के उत्तेजित रुख को झेलने के बाद मैं इस भीड़ की मानसिकता और जेबकतरों नामक राक्षसी वृत्ति के लोगों के बारे में सोचता रहता, लोगों से बात करता रहता.

लोग प्रायः जेबकतरों को दण्डित करने के पक्षधर ही मिले. पुलिस को सौंपने से क्या होगा? सब मिले हुए होते हैं, ऐसा ही विचार था अधिकांश लोगों का.

एक बार मुझे जेबकतरों द्वारा की जा रही तबाही का निजी अनुभव भी हो ही गया. दोपहर के वक्त मैं सफ़र कर रहा था लोकल ट्रेन में. भीड़ सामान्य से काफी कम थी. जब मैं ट्रेन से उतरा तो पता चला कि मेरी तीन जेबों पर एक-साथ आक्रमण हुआ था. नुकसान तो अधिक नहीं हुआ, किन्तु मेरी परेशानी यह थी कि मेरी तीन जेबों पर एक साथ आक्रमण हुआ और मुझे पता भी नहीं चला. अर्थात जेबकतरा एक नहीं था, कम से कम तीन तो थे.

एक दूसरा पहलू भी मिला मुझे, लोगों के साथ इस बारे में बात करते-करते. कुछ लोगों ने बताया कि जेबकतरे दो-तीन नहीं, भीड़ के रूप में चलते हैं. जिसका मौक़ा लग जाए, वह जेब काट लेता है, पकड़े जाने पर उसके अन्य साथी आम-जनता का जामा पहनकर ‘चोर-चोर’ चिल्लाने लगते हैं और अपने शिकार को ही पीटने लगते हैं. अन्य यात्री उस शिकार को ही जेबकतरा समझकर उसपर अपनी कुंठा से मुक्त होने का उपक्रम करने लगते हैं. इस कोलाहल में जेबकतरे वहां से फ़रार हो जाते हैं और वह आम आदमी अन्य आम आदमियों से पिटता रहता है.

भीड़ की आवाजें मेरी ओर बढ़ रही थीं, चीत्कार के साथ. देखते ही देखते भीड़ वहीं आ पहुँची जहां मैं बैठा था. एक सरदार जी, बिना पगड़ी के, बिखरे-बेतरतीब लम्बे बाल, सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, जगह-जगह से फटा हुआ और और मुसड़ा हुआ. चेहरे पर खरोंचों के निशान. क्रोध से भरी भाव-भंगिमा. एक हाथ में एक लंबा सा पेचकस और उनकी खुली हुई पगड़ी. दूसरे हाथ से एक आदमी के गिरेबान को पकड़े हुए और उसे घसीटते हुए.

मेरी बगलवाली सीट खाली थी. उन्होंने वह पगड़ी मेरी गोद में रखी और धम्म से उस खाली सीट पर बैठ गये. वह व्यक्ति भी घिसटता हुआ सामने ज़मीन पर आ पड़ा. सरदार जी ने पेचकस को सीधे हाथ में ज़ोर से पकड़ा और लगे उसे उस व्यक्ति के पेट में घुसाने. पूरी भीड़ ने ज़ोर से चीत्कार किया, “छोड़ दो सरदारजी, जाने दो,” की गुहार लगाने लगी.

ऐसा बार-बार होता. सरदार जी पेचकस को हथियार बनाकर उस व्यक्ति के पेट में घुसाने लगते और भीड़ चीत्कार कर उठती.

वह व्यक्ति जो सरदार जी की गिरफ़्त में था, रो-रोकर कहता, “आप मेरा आई.डी. कार्ड देख लें, मैं एक नौकरीपेशा शरीफ़ आदमी हूँ. मैंने कुछ नहीं किया.”

मैंने पंजाबी भाषा में बात की सरदार जी से. उन्होंने मुझे पूरे घटनाक्रम से अवगत कराया. बताया कि वह भारी नकदी लेकर कहीं जा रहे थे, कुरते की जेब में रखकर. एक जेबकतरे ने उनकी जेब में हाथ डाला तो उन्होंने पकड़ लिया. इतने में जेबकतरे के साथियों ने वही फ़ॉर्मूला लगाया और लगे पीटने सरदारजी को. थोड़ी देर बाद वे जेबकतरे तो कंपार्ट्मेंट की भीड़ में गुम हो गये और सरदारजी पिटते रहे आम आदमियों से.

“मैंने एक हाथ से अपने कुरते की जेब को पकड़ रखा था. वरना क्या मजाल इन गीदड़ों की, मुझपर हाथ उठा पाता कोई”, सरदार जी कह रहे थे, “हो सकता है यह गरीब जिसे मैंने पकड़ रखा है, बेक़सूर हो. मगर किसी ने तो मारा है मुझे. मेरी यह गत अपने आप तो बन नहीं गयी. इस भीड़ में अगर कोई मर्द हो, जो यह माने कि उसने मुझपर हाथ उठाया था, तो कसम वाहेगुरू की, मैं इस आदमी को छोड़ दूंगा और यह पेचकस उस मर्द के पेट में घुसा दूंगा. यह पेचकस मैं घर से ही लेकर निकला था ऐसे किसी वाकये के लिए. जल्दी थी, इसलिए मैं लोकल ट्रेन में आया वरना मैं टैक्सी से आता॰"

पेचकस और चीख़ों का यह खेल सान्ताक्रूज़ स्टेशन तक जारी रहा. तब तक सरदारजी ने पगड़ी बाँध ली थी, चेहरा साफ़ कर लिया था. सान्ताक्रूज़ स्टेशन पर उन्हें उतरना था.

उतरते वक्त उन्होंने उस व्यक्ति को अपनी गिरफ़्त से मुक्त किया और भीड़ को हिदायत दी, “आज के बाद कभी किसी को यूं ही जेबकतरा न समझ लेना. खुद देखो किसी को जेब काटते हुए, तभी यकीन करना.”

नज़दीक से
-       - विक्रम शर्मा



Tuesday, February 20, 2018

भजिया-पकौड़े वाला

गरम नींबू-पानी के कटोरे में हाथ धोकर गीले सुगंधित तौलिये से हाथ मुंह पोंछते हुए देवेश ने कहा, “भोजन सचमुच बहुत स्वादिष्ट था।“ सुनकर मुझे ऐसे प्रसन्नता हुई जैसे यह भोजन मैंने स्वयं बनाया हो।

मैं मुंबई में एक बैंक में कार्यरत था और मेरा छोटा भाई देवेश मुझसे मिलने मेरे पास आया हुआ था। कहने को कैरियर की दृष्टि से मैं एक सफल व्यक्ति था। लाखों-करोड़ों युवाओं का स्वप्न था बैंक में पी॰ओ॰ की नौकरी पाना। मेरा भी यह स्वप्न था और मैं इस स्वप्न को साकार कर चुका था। मेरे परिवार को गर्व था मेरी इस उपलब्धि पर। मेरा छोटा भाई भी मुझसे बहुत प्रभावित था और मेरी ही तरह एक पी॰ओ॰ बनाना चाहता था। मैं खुश था कि मेरा भाई मेरे पास रहने आया था। मैं चाहता था कि वह नज़दीक से देखे मेरा जीवन और उसके बाद अपने भविष्य के बारे में निर्णय ले।

मेरी नियुक्ति मुंबई फोर्ट क्षेत्र की एक शाखा में हुई थी। शुरू के दिनों में होटल में रुका जो बहुत महंगा था। फिर एक लॉज में ठहरा। कुछ दिनों बाद लॉज भी जेब को कचोटने लगी। एक चॉल में भी रुका, परंतु वहाँ एक दिन से अधिक ठहरा नहीं गया। चर्च गेट से विरार तक और वी॰टी॰ से लेकर ठाणे तक सभी क्षेत्रों में विकल्प तलाश मारे परंतु कहीं बात नहीं बनी।

एक सहकर्मी थे मेरे, मुझसे वरिष्ठ थे। हर रोज़ मुझसे आशियाना ढूँढने की कथा सुना करते। कांदीवली में रहते थे, अपने भाई के साथ। जैसे मेरे पास अनेक किस्से थे छत ढूँढने के, उसी प्रकार उनके पास अपने भाई की बेरोजगारी के अनेक किस्से थे। पता नहीं, उन्हें मेरी दुर्दशा पर तरस आया या फिर अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने का अवसर दिखा, एक दिन उन्होंने मुझे प्रस्ताव दिया उनके फ्लैट में उनके साथ रहने का। उसी रोज़ मैं उनके साथ उनके घर गया। दो छोटे कमरों का एक फ्लैट था। दो कमरों के बीच में जगह बनाकर एक छोटी रसोई और एक स्नानघर की व्यवस्था की गयी थी। दोनों भाई एक-एक कमरे में रहते थे।

“भीतर के कमरे में डबल बेड है। हम दोनों भाई वहीं सो सकते हैं। जब कभी घर से कोई आता है, तब हम ऐसा ही करते हैं। अब तो कोई आता भी नहीं यहाँ रहने। बाहर के कमरे में दीवान है, उसमें तुम रह सकते हो,” उन्होंने योजना समझाई, “रसोई में हम सिर्फ चाय बनाते हैं, दूध गरम करते हैं। खाना हम बाहर ही खाते हैं। दफ्तर में डिब्बा आता है और शाम को हम यहाँ एक आंटी के घर में खाकर आते हैं। तुम भी ऐसा ही कुछ कर सकते हो। अब तक भी तो यही कर रहे हो। तुमसे जो किराया मिलेगा उससे भाई का जेब खर्च निकल जाएगा।“ योजना उत्तम थी, यही तो मैं चाहता था।

तब से मैं वहीं कांदीवली में ही रह रहा था। बहुत सुविधाजनक नहीं था, परंतु उससे बेहतर कोई उपाय था भी नहीं। एक रोज़ मेरे वरिष्ठ सहयोगी के पिताजी आए, तो वे दो दिन उनके छोटे भाई ने मेरे कमरे में दीवान के साथ ज़मीन पर बिछौना लगाकर बिताए। एक छोटी मेज़ थी जिसे ज़मीन पर बिछौना बिछाने की जगह बनाने के लिए दीवार के साथ चिपका दिया जाता और दो फोल्डिंग कुरसियों को भीतर वाले कमरे में ले जाया जाता। बस उतनी ही जगह थी उस कमरे में।

मेरा छोटा भाई मुंबई आया तो भी हमने वही किया। ज़मीन पर बिछौना बिछाया जिसपर मेरा छोटा भाई देवेश ज़िद करके सोता और मुझे दीवान पर ही सोने को मजबूर करता। सुबह नाश्ते में हम हमेशा की भांति चाय के साथ ब्रैड-मक्खन या ब्रैड-जैम खाते। एक ही शौचालय/ स्नानघर के लिए सुबह के समय हम चार लोगों की कतार लगी रहती। कार्यालय में उन दिनों स्टाफ़ कम होने के कारण छुट्टी नहीं मिल रही थी। बहुत मुश्किल से दो दिन की छुट्टी का ही जुगाड़ कर पाया। बाकी दिन छोटे भाई को उसके दिन का कार्यक्रम बनाकर दे देता और वह अकेले ही मुंबई घूमता।

सुबह हम कांदीवली स्टेशन तक ऑटो में जाते। वहाँ से उलटी दिशा में बोरीवली के लिए ट्रेन पकड़ते। फिर बोरीवली से फ़ास्ट या डबल फ़ास्ट ट्रेन लेकर चर्चगेट जाते। कभी-कभी भाई को मैं रास्ते में बांद्रा या दादर उतार देता, आसपास की कोई जगह देखने के लिए। कान्दीवली से उलटे बोरीवली जाने के दो लाभ होते। एक तो बोरीवली से फ़ास्ट या डबल फ़ास्ट ट्रेन मिल जाती, जो कान्दीवली में रुकती ही नहीं थीं। दूसरे, जिस ट्रेन में बोरीवली जाओ, उसी में बैठे रहो। मुंबई लोकल में सीट पाने वाला राजा होता है, बाकी सब धक्के खाने वाली प्रजा। बोरीवली से चढ़ने वालों को भी अक्सर सीट नहीं मिलती थी।

शाम को देवेश मेरे कार्यालय में आ जाता और हम मिलकर मरीन ड्राइव घूमते, कोलाबा या फिर क्रॉफोर्ड मार्केट या फ़ैशन स्ट्रीट में यूं ही जूते घिसाते घूमते और सस्ती वस्तुएँ ढूंढते। वापसी में कोलाबा या दादर या बांद्रा या कान्दीवली के किसी रैस्टौरेंट में भोजन करते और वापस अपने-अपने बिस्तरों पर आकर सो जाते।

आज मैं अपने भाई को एक विशेष रैस्टौरेंट में लेकर आया था। “यह मेरे एक सीनियर का रैस्टौरेंट है,” मैंने उसे बताया था।

“क्या वह भी बैंक में काम करते हैं,” देवेश का यह एक स्वाभाविक प्रश्न था।

“अरे, बैंक में काम करते तो किसी लॉकर में चाभी घुमा रहे होते या किसी कस्टमर से सिर खपा रहे होते,” मैंने उत्तर दिया।

“तो क्या छोड़ दी उन्होंने नौकरी?”

“उनकी नौकरी लगी ही नहीं,” मेरा उत्तर था।

देवेश की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा, “फिर वह आपके सीनियर कैसे?”

फिर मैंने उसे पूरी बात बताई। मेरे उन सीनियर का नाम मनोज था। किताबों की एक दूकान पर मुलाक़ात हुई थी। बातचीत एक किताब को लेकर शुरू हुई थी। मैं पी॰ओ॰ प्रवेश परीक्षा के लिए उस किताब को खरीदने वाला था कि उन्होंने मुझे उससे बेहतर तीन चार किताबें सुझा दीं। मैंने एक दो प्रश्न किए तो उनकी जानकारी को देखकर अचंभित रह गया। उन्होंने वे सारी किताबें पढ़ी हुई थीं। उनका ज्ञान विस्मयकारी था। पता चला कि वह तीन साल से ऐसी विभिन्न परीक्षाएँ दे रहे थे। लगभग सभी परीक्षाओं में इंटरव्यू राउंड तक पहुँच भी जाते थे परंतु उनका सेवा में चयन नहीं हो पाता था।

मैं पहली बार ऐसी कोई परीक्षा दे रहा था और वह तीन साल में ऐसी अनेक परीक्षाएँ दे चुके थे, इस नाते वे मेरे सीनियर थे। उसके बाद से मैं उनके संपर्क में रहने लगा, फ़ोन के माध्यम से भी और व्यक्तिगत मुलाकातों से भी। वह मेरे मार्गदर्शक बन गए थे। वही बताते कि क्या पढ़ना है, किस स्रोत से पढ़ना है और किस विषय में अधिक समय नहीं गंवाना है। लगता था वह न केवल विषयवस्तु के ज्ञाता थे वरन परीक्षा-कला में भी पारंगत थे। फिर उनका चयन क्यों नहीं होता था? बहुत संकोच के साथ यह प्रश्न मैं उनसे भी करता और उत्तर में वह मुस्कुरा भर देते। उनकी मुस्कान के पीछे का दर्द मैं समझ सकता था। उनके मार्गदर्शन से लाभान्वित होकर अनेक लोग आज विभिन्न बैंकों की सेवाओं में थे। परंतु वह आज भी कतार में खड़े प्रतीक्षा कर रहे थे अपने चयन की।

एक बार उन्होंने बातों-बातों में मुझसे कह ही दिया कि यह उनका अंतिम प्रयास है, बैंक सेवा की परीक्षा का। उनकी बात सुनकर मुझे बहुत निराशा हुई। मैं उनके लिए प्रार्थना करने लगा। साथ ही मुझे यह भी लगने लगा कि जब इतने प्रतिभाशाली व्यक्ति का चयन नहीं हो रहा है तो मेरे चयन की तो संभावना ही नहीं थी। मैंने पूरे मनोयोग के साथ तैयारी शुरू कर दी। मनोज, यद्यपि अपनी लगातार असफलता से हतोत्साहित थे, मेरी सहायता करने में उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।

परीक्षा हुई, इंटरव्यू राउंड हुआ, सेवा के लिए मेरा चयन हो गया परंतु मनोज का चयन इस बार भी नहीं हुआ। मनोज ने मुसकुराते हुए मुझे गले लगाकर बधाई दी परंतु उनकी मुस्कान के पीछे मैं उनका दर्द अनुभव कर रहा था। “तुम मेरी चिंता मत करना। ईश्वर ने मेरे लिए कुछ और योजना बना रखी होगी,” एक दार्शनिक की भांति मनोज बोले।  

एक वर्ष की ट्रेनिंग के बाद मेरे नियुक्ति मुंबई फोर्ट की एक शाखा में हुई। मैंने मुंबई शहर के बारे में सुन रखा था कि उस शहर में बाहर के व्यक्ति का निर्वहन बहुत कठिन है और कोई वहाँ नियुक्ति नहीं चाहता। परंतु यह भी सुन रखा था कि एक बार यदि कोई मुंबई में रह जाए कुछ साल, तो उस शहर को छोड़ना नहीं चाहता।

ट्रेनिंग के इस पूरे वर्ष में मैं मनोज के संपर्क में था। पहले तो प्रायः हर रोज़ ही उनसे बात हो जाती थी। फिर वह व्यस्त हो गए और हमारी बात कम होने लगी। मज़े की बात यह थी कि वह मुंबई में ही थे। प्रतियोगिता परीक्षाओं की तरह ही उनका हमारे शहर से भी मन उकता गया था और वह अपने एक मित्र के पास मुंबई आ गए थे। यहाँ आकर उन्हें पता चला कि स्वयं उनके मित्र एक घटिया सी चॉल में कितनी कठिनाई से रहते थे। मेरे मित्र का संकल्प और अधिक दृढ़ हो गया और वह उसी चॉल में अपने खर्चे पर रहकर चौपाटी में भेलपुरी बेचने लगे। आसान यह भी नहीं था किन्तु पढ़े-लिखे होने के कारण वह इसे संभव बना पाए। परंतु यह उनकी मंज़िल नहीं थी। शीघ्र ही उन्होंने वरली क्षेत्र में किराए की एक दूकान में पकौड़े-भजिया, बड़ा-पाव बेचना शुरू कर दिया। अपने तेज़ दिमाग और किसी काम को छोटा न समझने की सोच के सहारे उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

“आज मनोज के चार रेस्टॉरेन्ट हैं मुम्बई शहर में और उनमें से एक में हमने अभी-अभी भोजन किया है,” कहकर मैंने अपनी बात समाप्त की और एक लंबी सांस ली।

"काश, आपका भी सेलेक्शन पी.ओ. के इम्तिहान में न हुआ होता...” देवेश बुदबुदा रहा था।


 

 

नज़दीक से

- विक्रम शर्मा



Wednesday, December 29, 2010

सुख

मैं एक व्यवसायी हूँ. एक सफल व्यापारी. व्यापार के कायदे कानून ठीक से जानता हूँ. कुछ लोग मुझे पसन्द नहीं करते, पीठ पीछे मेरी बुराई भी करते हैं. मैं जानता हूँ. किन्तु व्यापार में ये सब तो चलता ही है. सामने तो अधिकांश लोग मेरा सम्मान ही करते हैं!

वस्तुतः मैं धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति हूँ. नित नियमित पूजा-पाठ, मन्दिर जाना, दान-पुण्य, चन्दा देना, सभी धार्मिक अनुष्ठानों में नियमित भागीदारी, ये सब मेरे जीवन के अभिन्न अंग हैं.

पिछले सप्ताह एक चमत्कार हुआ. एक योगी बाबा के दर्शन हुए. अपनी आदत के अनुसार मैंने यथासंभव उनकी सेवा की. बाबा प्रसन्न हुए. बोले, "माँगो वत्स; क्या चाहते हो?"

मुझे लगा, मानो साक्षात ब्रह्म के दर्शन हो गये हों.

मांगने को बहुत कुछ था किन्तु मैं कुछ ऐसा मांगना चाहता था जिससे सभी कुछ मिल जाए.

मैंने बचपन में वह कहानी सुनी थी जिसमें एक व्यक्ति को एक सिद्ध पुरुष ने दो वरदान मांगने को कहा. वह व्यक्ति आलसी था और अपनी पत्नी से परेशान भी. उसने दो वर मांगे - एक, उसकी हथौड़ी अपने आप चलती जाए और दूसरे, जब तक वह चाहे, उसकी पत्नी कुर्सी से चिपकी रहे ताकि उसे परेशान न कर सके. ऐसे तुच्छ वरदान मांगकर उसने ऐसा स्वर्णिम अवसर व्यर्थ कर डाला.

मैं ऐसी बेवकूफ़ी नहीं करना चाहता था. अपनी समझ और ज्ञान का परिचय देते हुए मैंने निवेदन किया, "प्रभु! यदि आप मुझ तुच्छ प्राणी पर कृपा करना चाहते हैं तो मुझे सुख प्रदान करें."

"सुख से तुम्हारा क्या अभिप्राय है, वत्स. इम्पोर्टेड कार, एयरकण्डीशनर, कोठी - तुम किस वस्तु को सुख मानते हो? बोलो पुत्र, आज हम प्रसन्न हैं," योगीश्री मुस्कुराते हुए बोले.

मैं किसी वस्तु विशेष का नाम लेकर अपने वरदान को सीमित नहीं करना चाहता था. योगी थे, कि मुझसे स्पष्ट शब्दों में निवेदन करने को मुझे बाध्य कर रहे थे. मैंने तनिक विचार कर पुनः निवेदन किया, "प्रभु! मैं तुच्छ प्राणी क्या निवेदन करूँ? सुख का जो भी अर्थ आपकी दृष्टि में हो, मुझे वही प्रदान कर कृतार्थ करें."

योगी महाराज ने अर्थपूर्ण निगाहों से मुझे देखते हुए पूछा, "हमारी दृष्टि का सुख पाकर तुम प्रसन्न तो होगे बच्चा?"

"क्यों नहीं महाराज," मैं अपनी सफलता पर अभिभूत था. अन्ततः मैंने योगीश्री को मनचाहा वर देने के लिए राजी कर ही लिया था!

"तथास्तु," कहकर उन्होंने अपने कमण्डलु से पानी के छींटे मेरे मुँह पर दे मारे.

पलक झपकते ही मेरी काया-पलट हो गयी. मेरी वेशभूषा एक साधू के समान हो गयी. भगवा वस्त्र, हाथ में कमण्डलु, मस्तक पर तिलक, गले में मालाएँ. मैं अचम्भित, किंकर्त्तव्यविमूढ़ था.

"चलो बालक, तुम इस संसार से मुक्त हो. आज से तुम सन्यस्त हुए. अब तुम हमारे साथ हिमालय की कन्दराओं में तप के लिए प्रस्थान करो," योगी जी महाराज पूर्ववत मुस्कुराते हुए, किन्तु आदेशात्मक स्वर में बोले.

मेरा जैसे स्वप्न भंग हुआ. योगी के चेहरे की मुस्कान मुझे कुटिल लगने लगी. उनकी शक्ति का चमत्कार मैं देख चुका था, अभी-अभी भुगत चुका था. प्रतिवाद करना खतरे से खाली न था. इस विषम परिस्थिति में भी मैंने आत्मसंयम खोया नहीं. योगी के चरणों में मैं साष्टांग लेट गया और निवेदन किया, "भगवन! आप महान हैं. किन्तु मैं तो आपसे सुख मांग रहा था और आप मुझसे मेरा सब कुछ छीन ले रहे हैं! क्षमा याचना करता हूँ प्रभु, किन्तु मैंने ऐसा तो नहीं कहा था."

योगी अभी भी यथावत थे. मेरी आशंका के विपरीत वह क्रोधित न हुए. बोले, "बच्चा. हमारी दृष्टि का सुख तो यही है. इस नश्वर संसार को त्याग कर प्रभु की शरण में जाने वाले मार्ग से सुन्दर कोई मार्ग नहीं है और इस मार्ग पर चलने से बढ़कर कोई सुख नहीं!"

मेरी समझदारी ही मेरी दुश्मन बन गयी थी. मैं अपने ही चक्र में फंस गया था. इससे तो अच्छा होता मैं एक नया बंगला मांग लेता, अपनी पत्नी का स्वास्थ्य, बच्चों के लिए अच्छा व्यवसाय, या फिर और कुछ! यह मैं क्या मांग बैठा!

मैंने योगी के पाँव कसकर पकड़ लिये. आवाज़ में यथासंभव आदर-भाव लाकर मैंने पुनः निवेदन किया, "प्रभु! मैं यह वरदान पाकर धन्य हो गया. किन्तु मेरे हालात कुछ ऐसे हैं कि मैं अभी सन्यास नहीं ले सकता. बच्चे अभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हुए हुए; मेरा अपना व्यवसाय भी अभी कुछ विशेष जमा नहीं. ऐसे में मैं तो सन्यास लेकर निश्चित ही धन्य हो जाऊंगा किन्तु मेरे बीवी-बच्चों के साथ तो यह अन्याय हो जाएगा! क्षमा चाहूँगा भगवन, किन्तु मैं यह अन्याय कर पाने में स्वयं को असमर्थ पाता हूँ."

मुझे भय था कि यह सुनकर योगी रुष्ट हो जाएंगे. वह मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए बोले, "वत्स! मनुष्य की तर्क-पद्धति बहुत विचित्र है. वह किसी नियम के अनुसार नहीं चलती बल्कि अपने किंचित स्वार्थ एवं सुविधा से परिचालित होती है. मनुष्य स्वयं को कितना भी बुद्धिमान क्यों न माने, वह नहीं जानता कि उसका हित क्या है और शुभ क्या है. हम तुमसे तर्क-वितर्क करने नहीं आये. हमने तुम्हें एक वरदान मांगने को कहा और तुमने उसका प्रयोग कर लिया."

मुझे लगा जैसे उस योगी ने मुझे तान्त्रिक-शक्ति से कैद कर लिया हो. मन ही मन छटपटाते हुए मैंने विनम्रतापूर्वक रुंधे गले से कहा, "प्रभु! मैं, आपसे और वरदान नहीं मांग रहा. मैं तो मात्र इतना निवेदन कर रहा हूँ कि मुझे आप पूर्ववत सामान्य व्यक्ति बना दें. मुझे सन्यास लेने के लिए बाध्य न करें."

योगी महाराज के चेहरे के भाव पढ़ना कठिन था. वह बोले, "भक्ति का मार्ग मनुष्य को सुख देता है, उसे प्रतारणा नहीं. हम तुम्हारा मार्ग प्रशस्त तो कर सकते हैं, तुम्हें भक्ति नहीं दे सकते. भक्ति की कृपा तो स्वयं ईश्वर ही कर सकता है."

"परेशान न हो बच्चा. यह मार्ग तुम्हारे मांगने पर ही हमने तुम्हें दिया था. इसपर चलने के लिए तुम बाध्य नहीं हो," कहते हुए योगी ने पुनः जल के कुछ छींटे मुझ पर मारे. मैं पूर्ववत हो गया.

मैंने योगी के चेहरे को देखा. मुझे अब उस चेहरे पर व्याप्त मुस्कान कुटिल नहीं बल्कि भव्य और महान दीख रही थी. उनके मस्तक पर अपूर्व तेज था. इतनी सरलता से छुटकारा पाकर मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था. मुझे लगा, जैसे मैं उनके मस्तक के तेज को आत्मसात कर लूँ.

मैंने एक बार पुनः अपना सिर उन महान योगी के चरणों में रखकर निवेदन किया, "मुझसे भूल हो गयी भगवन! मुझे क्षमा करें. वस्तुतः मैं भक्तिमार्ग अपना सकूँ, इस योग्य नहीं हूँ, इसका ज्ञान तो आपने मुझे करा दिया. आपकी दृष्टि के सुख को मैं सुख नहीं मान सका क्योंकि मेरा हृदय अभी अपवित्र है. ईश्वर ने इसीलिए मुझे भक्ति का दान नहीं दिया. यह भी मैं समझ गया. किन्तु सुख की प्राप्ति के लिए क्या सन्यास लेना आवश्यक है?"

"कदापि नहीं पुत्र. एक सन्यस्त व्यक्ति का सुख सच्चे सन्यास में है. एक गृहस्थ के लिए सुख की परिभाषा यह नहीं," योगी महाराज ने स्पष्ट कहा.

"तो फिर ग्रृहस्थ का सुख क्या है? सुख देने वाली प्रायः सभी वस्तुओं का संग्रह और उपभोग मैं कर रहा हूँ. फिर भी मैं सुखी अनुभव क्यों नहीं करता," मैंने जिज्ञासा व्यक्त की.

"क्योंकि जिसे तुम सुख कह रहे हो, वह सुख है ही नहीं. ये सब तुम्हारी आकांक्षाएं मात्र हैं जिनका जन्म माया की चकाचौंध से हुआ है. इन आकांक्षाओं की पूर्ति की हवस में मनुष्य सुख का विचार ही नहीं करता.

अन्तर्मन में सच्चे सुख का अहसास होते हुए भी मनुष्य उसके प्रति आंखें मूंद लेता है - वह उसे निर्मूल प्रतीत होता है. सुख के पीछे मनुष्य की दौड़ सिर झुका कर दौड़ रहे सूअर की दौड़ के सदृश है. क्या यह दौड़ उसे वास्तविक सुख दे सकती है? ऐसा सुख तो मनुष्य के आत्मक्षय का कारण ही बन सकता है. इस सुख की अभिलाषा ही व्यक्ति को क्षोभ व असन्तोष देती है - और अन्ततः विक्षिप्तता!"

"तो क्या मनुष्य इच्छा करना छोड़ दे, कार्य करना ही छोड़ दे," मैंने बीच में टोका.

"इच्छा किसकी? बहुधा मनुष्य धन, सत्ता और शक्ति में सुख ढूँढता है. यह सुख नहीं, सुख का भ्रम है. इस सुख की प्राप्ति में व्यक्ति मदमस्त हो सकता है, सुखी नहीं. और यही सुख मनुष्य को अनवरत भय और पीड़ा भी देता है. भय, अपने संग्रहीत ’सुखों’ के खो जाने का, और पीड़ा इनके वास्तव में खो जाने पर; क्योंकि ये समस्त सुख नश्वर ही तो हैं," योगीश्री सीधे-सीधे सच बोलते जा रहे थे. ऐसा सच जिससे हम सब बचते-फिरते हैं.

"धन, शक्ति और सत्ता की नहीं तो फिर किन सुखों की इच्छा मनुष्य को करनी चाहिए," मैं स्वयं को रोक नहीं पाया, यह प्रश्न करने से.

"प्रत्येक मनुष्य जानता है कि सुख क्या है. आवश्यकता है उसे पहचानने की. एक रुग्ण व्यक्ति जानता है कि उसे हलका-फुलका आहार लेना चाहिए. फिर भी उसे चाट-पकौड़ी और पकवान ही आकृष्ट करें तो वह उनका सेवन स्वास्थ्य की कीमत चुका कर ही कर सकता है," योगीश्री ने स्पष्ट किया.

"फिर भी कृपा कुछ तो स्पष्ट करें कि सुख क्या है! मैं मूर्ख उससे कुछ दिशा-निर्देश ही ले लूँगा," मैंने आग्रह किया.

"सुख है प्रेम करना - सम्पूर्ण जगत से - बिना प्रतिदान की अभिलाषा के.

"मनुष्य का शरीर नश्वर है पुत्र. शाश्वत तो है केवल मनुष्य का विवेक, विश्वास और प्रेम. यह प्रेम उस निराकार ब्रह्म से भी हो सकता है और उसके द्वारा रची गयी इस सृष्टि से भी," योगी जी महाराज पूर्ववत मुस्कुरा रहे थे!

नज़दीक से

- विक्रम शर्मा