Tuesday, October 6, 2020

चवन्नी

 दुक्की की आँख खुली॰ अभी अंधेरा था॰ गर्मियों में तो वैसे भी सूरज जल्दी निकल जाता है॰ मतलब, अभी रात थी॰ फिर भी उसने उठकर खिड़की के बाहर झाँका॰ सचमुच रात थी॰ वापस लेट गया परंतु नींद नहीं आई॰ थोड़ी देर बाद फिर उठकर रसोई जाकर पानी पिया और बैठक में जाकर घड़ी देखी॰ अभी चार बजे थे॰ पौ फटने में अभी देर थी॰ वापस बिस्तर पर जाना पड़ा दुक्की को, हालांकि अब नींद कहाँ आने वाली थी उसे॰

दुक्की को उसका नाम किसने दिया था, यह ज़िम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं था॰ दादाजी तो अब रहे नहीं॰ होते तो पूछता उनसे कि क्यों रखा यह नाम॰ यह भी कोई नाम हुआ! स्कूल के रजिस्टर में कोई भी नाम लिखा हो, सब उसे पुकारते तो इसी नाम से थे न! पिताजी से पूछता तो वह बस मुस्कुरा भर देते॰ गली के बच्चे उसे बताते कि जिस प्रकार ताश के पत्तों में सबसे कम मूल्य दुक्की का होता है, वैसे ही उसका मूल्य भी सबसे कम होने के कारण सब उसे दुक्की बुलाते हैं॰ देखने में तो वह कृशकाय था ही॰ वह खाना कम खाता था और टॉनिक अधिक पीता था, जब से उसने होश संभाली तब से॰

माँ इन कहानियों को झुठलातीं और उसे बतातीं कि वह परिवार में दूसरे नंबर का बच्चा था इसलिए उसे दुक्की नाम दिया गया था॰ मगर तायाजी का बेटा जो परिवार में पहले नंबर का बच्चा था उसे तो कोई इक्का नहीं कहता॰ चाचा जी के तीसरे नंबर वाले नन्हें बच्चे को भी कोई तिक्की नहीं कहता! फिर उसे ही क्यों दुक्की कहते थे सब?

चाचाजी के मन्नू को कोई दुक्की कहे, इस विचार से ही सिहर गया दुक्की॰ मन्नू से बहुत प्यार करता था दुक्की॰ चाहे जो हो जाए, वह किसी को दुक्की नाम से नहीं पुकारने देगा मन्नू को, उसने एक बार फिर मन ही मन प्रतिज्ञा की॰

गरमियों की छुट्टियाँ चल रही थीं॰ इस साल भी दुक्की को छुट्टियाँ घर में ही बितानी थीं॰ उसके पिताजी एक सरकारी कार्यालय में एल॰डी॰सी॰ थे॰ सीमित संसाधन थे और एक-एक पैसे को दाँत से पकड़ कर खर्च करने की उनकी आदत थी॰ केवल एक ही क्षेत्र था जिसमें खर्च करने में वह दिलदार थे॰ और वह क्षेत्र था, बच्चों की शिक्षा॰ सादा पौष्टिक भोजन और अच्छी शिक्षा के अतिरिक्त सब खर्च उन्हें फिजूलखर्च लगते थे॰ तीनों भाइयों में आर्थिक दृष्टि से सबसे कमजोर थे दुक्की के पिताजी, परंतु वह संतुष्ट थे अपने जीवन से॰

अभी दो हफ्ते ही उनका परिवार उसके चाचाजी के घर गया था, मन्नू को देखने, परंतु दुक्की का मन नहीं भरा था॰ वह मन्नू के पास रुकना चाहता था, अपने नन्हें छोटे भाई को करीब से देर तक देखना चाहता था, उसके साथ खेलना चाहता था॰ परंतु उसके माता पिता ने उसे मना कर दिया था॰ शायद आने-जाने में खर्च होता है इसलिए॰ दुक्की के बहुत ज़िद करने पर उसके पिताजी ने उसे अकेले जाने की अनुमति दे दी थी॰ माँ ने विरोध किया था उसके अकेले जाने का परंतु पिताजी ने कहा था, “अब बड़ा हो रहा है दुक्की॰ अब उसे सीखना चाहिए, अकेले जाना भी॰“

आज दुक्की अपने नन्हें भाई मन्नू से मिलने जा रहा था, अकेले, बस में बैठकर॰ उसके उत्साह का कोई ठिकाना न था॰ बहुत मुश्किल से रात कटी और अंततः सुबह हुई॰

दुक्की तो मानो उड़कर मन्नू के पास पहुंचना चाहता था, परंतु उसकी माँ जैसे उसे जाने ही नहीं देना चाहती थी॰ जानबूझकर सब कार्य धीरे धीरे कर रही थी और दुक्की खीझ रहा था कि माँ जल्दी क्यों नहीं कर रही! पिताजी ने मामले को भांपकर कहा कि देर होने से गर्मी बढ़ती जाएगी और लू चलनी शुरू हो जाएगी॰ तब जाकर माँ ने उसे नाश्ता कराया और उसे यथासंभव जल्दी रवाना किया॰ दुक्की कुछ दिन रुकना चाहता था मन्नू के पास परंतु उसकी माँ ने उसे एक ही जोड़ा कपड़े दिए एक छोटे से बैग में और दुक्की को हिदायत दी कि वह अगली सुबह पहले पहर में ही वहाँ से वापस घर के लिए निकल ले॰ रास्ते में खर्च के लिए एक अठन्नी दी और कहा कि खरीदकर ठंडा पानी पीते रहना॰

दुक्की अब बस स्टैंड पर खड़ा था॰ इस बस स्टैंड और बसों के नंबरों से उसका गहरा परिचय था॰ कई बार आया था वह यहाँ, अपने माता पिता के साथ॰ बसें आ रही थीं, परंतु भरी हुई॰ दुक्की जानता था कि थोड़ी देर के बाद एक न एक बस आएगी जिसमें आसानी से चढ़ा जा सकेगा॰ बस की टिकिट 20 पैसे की थी॰ दुक्की को आधी टिकिट लेनी थी अर्थात 10 पैसे की टिकिट॰ एक प्राइवेट मिनी बस आई जिसमें बैठने के लिए सीटें खाली दिख रही थीं॰ मिनी बस में हाफ़ टिकिट 15 पैसे की थी॰ इसलिए दुक्की ने उसे छोड़ने और सरकारी बस ही लेने का निर्णय लिया॰ बीच बीच में फोर-सीटर भी आ रहे थे परंतु उसमें चढ़ने का तो विचार भी नहीं कर सकता था दुक्की॰ पूरी अठन्नी, जिसका स्वामी था दुक्की, लेकर ही उस फोर-सीटर की विलासिता का रसास्वादन कर सकता था वह॰ अगर फोर-सीटर में चला गया तो वापस कैसे आएगा वह? स्टैंड पर खड़े दुक्की को आधा घंटा से अधिक हो गया था॰ सामने खड़ा हुआ पानी वाला उसे अपनी ओर खींच रहा था परंतु दुक्की ने यह निश्चय कर लिया था कि वह बस के अपने गंतव्य पर पहुँचने के बाद ही पानी के गिलास पर पाँच पैसे खर्च करेगा॰ उसके पास अठन्नी थी, जो बहुत थी, परंतु इतनी बड़ी राशि भी नहीं, कि वह फिजूलखर्ची कर सके॰

सामने से दो व्यक्ति आ रहे थे, जिन्हें वह जानता था॰ वे लोग उसकी गली में भीख मांगने आया करते थे॰ आज शनिवार था तो उनके हाथ में तेल के डब्बे थे॰ आज वे शनि का दान मांगकर वापस जा रहे थे॰ या शायद कहीं और जा रहे होंगे बेचारे भीख मांगने, दुक्की का हृदय उनकी विपन्नता को देख भर आया॰ परन्तु वे दोनों उसके पास तक नहीं आए॰ सड़क पर खड़े फोर-सीटर में ठाठ से बैठे और फुर्र से चला गया उनका फोर-सीटर॰ दुक्की मुंह बाये उनकी तरफ देखता रह गया॰

आखिरकार एक सरकारी बस आई जो अपेक्षाकृत कम भरी हुई थी और दुक्की उसमें चढ़ गया॰ टिकिट लेने के बाद उसके पास चालीस पैसे बचे थे – एक चवन्नी, एक दस पैसे और एक पाँच पैसे का सिक्का॰ बस से नीचे उतरा तो तब तक वह कई बार सोच चुका था कि सबसे पहले वह एक गिलास पानी पिएगा॰ माँ ने भी कहा था, पानी पीते रहना॰ वैसे भी उसका गला सूख रहा था॰ सीधे वह पानी वाले के पास गया और एक गिलास पानी एक घूंट में ही पी गया॰ उसका मन हुआ कि वह एक गिलास पानी और ले ले परंतु उसने स्वयं को रोक लिया॰ उसे स्मरण था कि पिछली बार जब वह यहाँ आया था तो एक भुने चने वाला अपने चने उसे बेचना चाहता था परंतु माँ ने मना कर दिया था॰ आज उसके पास दस पैसे का सिक्का था, जिसे वह अपनी मर्ज़ी से खर्च कर सकता था॰ चने की पुड़िया का दाम भी दस पैसे ही था॰ पूरे सोच विचार के बाद उसने अपने दस पैसे के सिक्के के बदले वह चने के पुड़िया अपने कब्जे में कर ली॰ चवन्नी आते हुए खर्च हुई, और वापसी के लिए भी उसके पास एक चवन्नी थी, बची हुई चवन्नी को जेब के हवाले करते हुए अपनी सफल योजना पर आत्मविभोर होते हुए वह सोच रहा था॰

बस स्टैंड से चाचा का घर करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर था॰ बस स्टैंड से साइकल रिक्शा मिलते थे चाचा के घर के लिए परंतु उसके माता पिता उसे हमेशा पैदल ही लेकर जाते थे॰ कहते थे इतनी भीड़ है यहाँ कि रिक्शा से पहले तो पैदल ही पहुँच जाए व्यक्ति॰ स्वभावतः दुक्की भी अपनी चने के पुड़िया हाथ में पकड़े एक एक दाना चने का मस्ती में खाते हुए पहुँच गया चाचा के घर॰

उसे देखकर चाची और मन्नू बहुत खुश हुए॰ चाची ने उसे बहुत प्यार किया॰ मन्नू की निगाहें भी खुशी के साथ दुक्की का पीछा करतीं॰ जिधर भी दुक्की जाता, मन्नू उधर ही देखता और खिलखिलाकर हँसता॰ घंटों दुक्की और मन्नू यही खेल खेलते रहे॰ चाची ने दुक्की को जूस पिलाया, उसकी पसंद का खाना खिलाया और उसे कुछ दिन वहीं रह जाने के लिए बार-बार कहा॰ दुक्की ने कहा कि वह तो एक ही जोड़ा लाया है अगले दिन पहनने को, तो चाची ने मनुहार कर कहा, “तू उसकी चिंता मत कर बेटे, तेरे चाचा शाम को तेरे लिए ढेर सारे जोड़े बाज़ार से लाकर दे देंगे॰“

चाचाजी एक सम्पन्न व्यापारी थे॰ दुक्की के पिताजी अपने भाई को सरकारी नौकरियों के फ़ॉर्म लाकर देते परंतु चाचाजी या तो फ़ॉर्म भरते ही नहीं, या फिर नौकरी की परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाते॰ वर्षों की बेरोजगारी के बाद उन्होंने अपने एक मित्र के साथ दूकान-दूकान जाकर तेल बेचना शुरू किया और बाद में मेहनत कर इसी क्षेत्र में एक बड़े व्यापारी बन गए॰ जहां दुक्की के पिताजी को एक जोड़ा कपड़ा खरीदने के लिए भी योजना बनानी पड़ती थी, वहीं उसके चाचाजी यूं ही दस-बीस जोड़े खरीद सकते थे॰ 

परंतु दुक्की को अपनी माँ की बात याद थी॰ उसने मना कर दिया॰ बोला, “अभी तो मुझे कल जाना ही है॰ दोबारा फिर आ जाऊंगा, माँ पिताजी से पूछकर॰“

चाचाजी शाम को देर से आए॰ सबको बाज़ार ले गए॰ दुक्की का मनपसंद खाना खिलवाया, आइसक्रीम भी खिलवाई॰ उपहार भी खरीद कर दिए॰ देर रात को सब घर वापस आए॰ घर आकार चाचाजी ने भी उसे रुकने को कहा और यह भी कहा कि यदि वह अगले दिन सुबह के स्थान पर शाम तक रुक जाए तो चाचाजी शाम को स्वयं उसे छोड़ आएंगे॰ दुक्की रुकना चाहता था परंतु माँ पिताजी उसकी प्रतीक्षा करते होंगे, यह सोचकर उसने मना कर दिया॰

रात को जब दुक्की सोने गया तो वह बहुत प्रसन्न था॰ सोच रहा था कि क्या उसका हर दिन ऐसा ही नहीं हो सकता जब वह मन्नू के साथ खेले, स्वादिष्ट भोजन खाए, माँ, पिताजी, चाचीजी और चाचाजी सबका प्यार मिले उसे! परंतु ऐसा कैसे हो सकता है॰ उसके पिताजी तो गरीब हैं और चाचाजी अमीर! अगर उसे चुनना पड़े तो वह माँ पिताजी को ही तो चुनेगा॰ चाचाजी चाचीजी उसे प्यार तो बहुत करते हैं, मगर... दिन भर का थका हुआ दुक्की अपने इन्हीं विचारों के साथ कब सो गया, उसे पता ही नहीं चला॰

सुबह दुक्की की नींद देर से खुली॰ चाचाजी काम पर जा चुके थे॰ चाचीजी ने भी उसे जल्दी नहीं उठाया क्योंकि वह कल दिन भर का थका हुआ था और रात देर से सोया था॰

दुक्की जल्दी जल्दी नहाकर तैयार होने के उपक्रम में जुट गया॰ माँ ने कहा था पहले पहर में ही लौट आने को॰ अब तो वह दूसरे पहर में पहुँच जाए तो भी गनीमत थी॰ नहाते-नहाते वह अपनी चवन्नी को खर्च करने की योजना बना रहा था॰ दस पैसे तो बस के किराये में खर्च हो जाएंगे॰ बाकी के पंदरह पैसे वह कल की तरह ही खर्च करेगा॰ पाँच पैसे का पानी वह कल की तरह बस यात्रा के समाप्त होने के बाद ही पिएगा॰ बाकी के दस पैसे का क्या करना है, इसके लिए उसके दिमाग में अनेक विकल्प आ रहे थे॰ बहुत सोचने के बाद उसने निर्णय लिया कि वे दस पैसे की गंडेरियां खरीदेगा॰ गर्मी का मौसम है, जिसमें गंडेरियां स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अच्छी रहेंगी और स्वाद में तो वे मीठी होती ही हैं॰ एक और लाभ - बस स्टैंड से घर तक का रास्ता भी मज़े में कट जाएगा॰ गरमी कम लगेगी॰

नहाकर दुक्की ने कपड़े बदले और कल के कपड़ों में से चवन्नी निकालने के लिए उनकी जेबें टटोलने लगा॰ चवन्नी तो वहाँ नहीं थी॰ हो सकता है बैग में रख दी हो चवन्नी उसने॰ बैग को कई बार देखा॰ उसमें भी नहीं थी चवन्नी॰ पूरा बिस्तर छान मारा, कई बार॰ चवन्नी वहाँ भी नहीं मिली॰ पलंग के नीचे भी नहीं॰ रात को छत पर गया था वह॰ शायद वहाँ गिर गई हो॰ भाग कर छत पर गया॰ वहाँ भी नहीं मिली॰ दुक्की के चेहरे का रंग सफ़ेद पड़ गया॰ कहाँ गई चवन्नी? अब वह घर कैसे जाएगा?

नाश्ता तैयार था॰ चाची उसे बुला रही थीं मगर दुक्की की भूख मारी गई थी॰ चाची को भी समझ नहीं आ रहा था कि अभी तो यह लड़का जल्दी मचा रहा था और अब नाश्ते के लिए नहीं आ रहा॰ मन्नू से मिलने के बहाने वह उसके कमरे में गया और वहाँ भी चवन्नी की तलाश की॰ चवन्नी का कहीं पता नहीं चल रहा था॰

नाश्ते की मेज़ पर चाची बार बार पूछ रही थीं कि क्या हुआ परंतु दुक्की क्या बताता उन्हें? कि उसकी चवन्नी गुम हो गई थी? कि उसके माता पिता ने उसे सिर्फ़ एक अठन्नी देकर भेज दिया था? कि उसके माता पिता इतने गरीब हैं? कि दुक्की इतना लापरवाह है कि एक चवन्नी भी नहीं संभाली गई उससे? यह भी तो हो सकता है कि चाची यह समझें कि दुक्की झूठ बोल रहा है॰ क्या पता खर्च कर दी हो उसने पूरी अठन्नी! क्या पता उसके माता-पिता ने उसे सिर्फ़ चवन्नी ही दी हो और यह कहा हो कि झूठ बोलकर वापसी का किराया वह चाची से ले ले॰ वह यह भी तो सोच सकती थीं कि दुक्की ने चवन्नी छुपा कर रखी है और चाची से भी पैसे ऐंठने के लिए वह झूठ बोल रहा है॰ दुक्की का बालक मन एक धौंकनी की तरह चल रहा था और उसमें विचारों का जैसे दावानल बह रहा था॰

नहीं, वह चाची जी को कुछ नहीं बताएगा॰ अपने माता पिता के सम्मान को बनाए रखेगा॰ उसके माता पिता अमीर नहीं परंतु समाज में उनका आदर है॰ वह पैदल घर चला जाएगा किन्तु हाथ नहीं फैलाएगा।

होठों पर नकली मुस्कान ओढ़े एक बार फिर मन्नू से मिला, चाची जी को उसने प्रणाम किया और धीमे कदमों के साथ वह चाची जी के घर से बाहर निकल आया॰ बाहर आते हुए भी उसकी निगाहें अपनी चवन्नी को ही ढूंढ रही थीं॰

अब क्या करे वह? उसके अपने घर से बस स्टैंड लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर था और चाची जी के घर से बस स्टैंड लगभग डेढ़ किलोमीटर॰ बस स्टैंड से बस स्टैंड की दूरी लगभग पाँच छह किलोमीटर होगी॰ या शायद सात किलोमीटर॰ कुल मिलाकर सात से नौ किलोमीटर की दूरी थी जो दुक्की को तय करनी थी॰ ढाई किलोमीटर तो वह कल भी चला ही था॰ आज पाँच छह किलोमीटर ज़्यादा चलना था॰ या शायद सात किलोमीटर॰

उसके बैग में चाचा के दिए हुए उपहार थे॰ क्यों न वह उपहार बाज़ार में बेच कर वह किराए के पैसों की व्यवस्था कर ले? परंतु इसमें एक जोखिम था॰ क्या पता दूकानदार समझे कि वह चोरी का माल है और वह एक चोर है॰ यदि ऐसा हुआ और उसे पुलिस के हवाले कर दिया तो उसके माता पिता के आदर-सम्मान का क्या होगा? यह जोखिम वह नहीं ले सकता था॰

इसी ऊहापोह में उसने देखा कि वह बस स्टैंड के निकट पहुँच गया था॰ अर्थात लगभग डेढ़ किलोमीटर तो वह चल चुका था॰ किन्तु उसने यह भी अनुभव किया कि कल ये डेढ़ किलोमीटर चलने में उसे तनिक भी कठिनाई नहीं हुई थी, जबकि आज उसे पसीना आ रहा था, प्यास लग रही थी॰ सूर्य सिर के ठीक ऊपर आ रहा था॰ थोड़ी ही देर में गर्मी असहनीय हो जाएगी, उसने सोचा॰ बस स्टैंड के रास्ते में एक मंदिर था, इसकी उसे जानकारी थी॰ वह मंदिर की ओर मुड़ गया॰

मंदिर में उसने पानी पिया, मुंह-हाथ भी धोया॰ बाल अच्छे से गीले कर लिए॰ रूमाल भी गीला कर लिया॰ आज सूर्य के प्रकोप से सामना होने वाला था दुक्की का॰ मंदिर में सुस्ताने के समय दुक्की ने विचार किया कि वह शेष छह सात किलोमीटर को छह भागों में बाँट कर यात्रा पूरी करेगा॰ यदि वह एक बार में एक से डेढ़ किलोमीटर पूरे कर सकता है तो वह हर एक से डेढ़ किलोमीटर की यात्रा को अलग अलग यात्राएं मानकर पूरा करेगा॰ यह विचार आते ही उसने अपने भीतर एक नई ऊर्जा का अनुभव किया॰ उसने तय किया कि वह न केवल पैदल घर पहुंचेगा बल्कि सकुशल पहुंचेगा और बीमार भी नहीं पड़ेगा ताकि उसके माता पिता को पता न चले कि उसने चवन्नी खो दी थी॰

बस का मार्ग सीधा था इसलिए उसे रास्ता समझने का कोई झंझट नहीं था॰ झंझट यह था कि पाँच छह किलोमीटर का राजमार्ग होने के कारण रास्ते में कोई बड़ा मंदिर नहीं था जहां वह आराम कर सकता और पानी पी सकता॰ पानी पीने के लिए उसे दो तीन बार राजमार्ग से भीतर आना पड़ा जिससे उसका रास्ता कुछ और लंबा हो गया॰ परंतु यह योजना उसके काम आई और वह किलकिलाती धूप में कुछ घंटों की यात्रा सम्पन्न कर अपने घर पहुँचने में सफल हो गया॰ एक झूठ उसे अवश्य बोलना पड़ा कि रास्ते में बस खराब हो गई थी॰ उसे डर था कि कहीं उसे लू न लग गई हो, इसलिए उसने माँ से मांगकर ढेर सारी शिकंजी पी और खूब देर तक स्नान किया॰ परंतु माँ को पता नहीं चलने दिया कि उसकी चवन्नी के साथ क्या किया था दुक्की ने॰

रात को दुक्की घोड़े बेचकर सोया॰ अगले दिन सुबह फिर देर से नींद खुली॰ माँ कपड़े धो रही थी॰ दुक्की ने सुना, माँ ने उसके उठते ही उससे प्रश्न दागा, “कल चवन्नी का क्या किया था? पानी भी नहीं पिया?”

दुक्की को काटो तो खून नहीं॰ कैसे पता चला माँ को सारी बात का? आँखें मलता हुआ और डरते हुए वह माँ की ओर बढ़ा॰ माँ के हाथ में एक चवन्नी थी और वह कह रही थी, “तेरी हाफ़ पैंट की जेब फटी हुई है, यह भी नहीं बताया तूने! शुकर है निक्कर के पोंचों की तुरपाई भी उधड़ी हुई है, अंदर से॰ बच गई चवन्नी - उसमें फँसकर!”


Wednesday, September 2, 2020

रुतबे वाले

एक प्रॉपर्टी डीलर का फ़ोन था। उससे बात कर फ़ोन काटा तो अनायास तोतले डॉक्टर साब का स्मरण हो आया।

हमारे मोहल्ले के सबसे अधिक लोकप्रिय डॉक्टर थे वह। उनका नाम याद रखने का कष्ट कोई नहीं करता था, सब उन्हें तोतला डॉक्टर के नाम से ही जानते थे। वैसे भी उनके क्लीनिक पर बोर्ड लगा तो था, परन्तु उस पर क्या लिखा था, कोई पढ़ नहीं पाता था। बरसों पुराना बोर्ड था, टूटा फूटा, धूल मिट्टी, बारिश के हज़ारों थपेड़ों ने उसे बदरंग, बेहाल कर रखा था। परन्तु डॉक्टर साब ने शायद कभी उसे देखा ही नहीं। उनकी प्रैक्टिस तो वैसे ही खूब चलती थी।

डॉक्टर साब तोतले थे परन्तु बात करने के बहुत शौकीन थे। कहने को तो उनका क्लीनिक सारा दिन खुला रहता था, परन्तु वह अपने क्लीनिक में कम और आस-पास की दुकानों में अधिक पाए जाते थे, बतियाते हुए। कई बार तो वह किसी और की दूकान में बैठकर मरीज़ों का इलाज भी कर दिया करते थे। कई लोग पसंद भी करते थे, किसी और दूकान में दिखाना, क्योंकि कहीं और बैठ कर वह मरीज से अपनी फ़ीस नहीं लेते, "अले तभी त्लीनित में आओदे तो लेंदे पैसे, यहां त्या लेने पैसे!" वैसे, अपने क्लीनिक में भी अपनी फ़ीस लेने से अक्सर शरमाते थे वह, "अले, अदली बाल तभी आओदे तो लेे लेंदे पैसे, धल ती ही तो बात है।"

पूरे मोहल्ले के चहेते थे डॉक्टर साब। किसी को कैसी भी ज़रूरत हो, डॉक्टरी परामर्श की या फिर कैसी भी, एक व्यक्ति जिसका विचार सबसे पहले आता था, वह थे तोतले डॉक्टर साब।

एक दिन मैं उनके क्लीनिक में गया तो उन्होंने तुरंत मिठाई का डिब्बा आगे कर दिया। बहुत प्रसन्न थे वह, "दमीन ती रजिस्त्री तरवाई है आद। अपना मतान बनवाना है अब!"

उस दिन से वह आसपास की दुकानों में दिखने बंद हो गए। मकान बनवाना शुरू कर दिया था उन्होंने। हर रोज़ वहीं जाते थे, राज मिस्त्रियों के साथ खड़े होकर बनते हुए मकान की देखभाल करते थे। "अले, पूली फैमिली ता सपना है, अपना मतान। दूसरों पर तैसे छोड़ सतते हैं?" 

एक अनधिकृत बस्ती में प्लॉट खरीदा था डॉक्टर साब ने। अब जो डॉक्टर अपनी फ़ीस लेने में भी शरम करेगा, वह किसी पॉश इलाके में तो मकान लेे नहीं सकता! एक छोटे से प्लॉट में डॉक्टर साब अपने सपनों का आशियाना बना रहे थे। उनकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं था। 

एक दिन डॉक्टर साब बहुत मायूस बैठे थे अपने क्लीनिक में। मैं यूं ही चला गया था, उनसे उनके मकान की प्रगति के बारे में पूछने। रुआंसे डॉक्टर साब ने जवाब दिया, "मतान तो पूला हो दया है, मदल उसे एत दुंडे ने तिसी औल तो बेत दिया।"

मैं समझा नहीं। उनका मकान किसी और ने किसी तीसरे को बेच दिया! यह कैसे संभव है? उन्होंने विस्तार से बताया कि उस गुंडे के पास भी उस मकान के काग़ज़ात थे और अब उस मकान पर कब्ज़ा भी किसी और का है। "तुछ नहीं हो सतता। मैंने बात तल ली है, वतीलों से।" उन्हें सांत्वना देकर मैं घर जा रहा था तो मन उद्वेलित था। चाहता था कुछ करूं उनके लिए परन्तु विवश था।

कुछ दिन बाद उनके क्लीनिक के सामने से गुज़रा, तो मेरी निगाहें दूसरी ओर थीं। उनसे निगाहें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। सपने चूर चूर होने का दर्द मैं समझ पा रहा था। परन्तु भीतर से डॉक्टर साब ने मुझे देख लिया था। ज़ोर से मेरा नाम पुकारते हुए बाहर आए और मुझसे खुशी से लिपट गए, "मैंने आपती आंथों में अपने लिए दर्द देथ लिया था उस दिन। मैं आपते धल आने ती सोच ही लहा था आपतो थुशथबली देने।" 

"क्या मकान वापस मिल गया आपका?" अति उत्साह में मैंने तुरन्त पूछ लिया।

"मेला मतान तो नहीं, वह तो बित दया था न! उस दुंडे ने मुझे एत दूसला मतान दिला दिया है। तल उसती रजिस्त्री भी हो दयी औल तब्जा भी। तब्जा हो जाए तो तोई फितर नहीं," डॉक्टर साब बहुत खुश थे, "एत पेशंत है, मेरा, बहुत लुतबे वाला, उसने तला दिया यह ताम।"

वहां से निकला तो मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह बात खुश होने की थी अथवा नहीं। डॉक्टर साब की खुशी में तो मैं खुश था, परन्तु सोच रहा था, उस व्यक्ति के बारे में जिसका मकान उस गुंडे ने डॉक्टर साब को दे दिया था। उस बेचारे के पास यदि किसी रुतबे वाले तक पहुंच नहीं हुई तो? क्या उसके जीवन भर की कमाई यूं धोखाधड़ी से कोई दूसरा छीन लगा? कैसी है हमारी कानून व्यवस्था?

कई दिन परेशान रहा, यह सोचकर कि क्या हुआ होगा उस व्यक्ति का। बेबस था, उसकी मदद नहीं कर सकता था। हां, अपने लिए अवश्य एक सबक लिया कि कभी अनधिकृत क्षेत्र में मकान नहीं खरीदूंगा, चाहे सारी उम्र किराए के मकान में रहना पड़े।

दशकों हो गए इस घटना को। जीवन भर इस बात को मैंने गांठ बांधे रखा। अनेक अवसर आए, पक्की रजिस्ट्री, मीठा पानी के वायदे के साथ सस्ता मकान लेने की परन्तु मैं किसी नामी बिल्डर से मकान खरीदने के अपने निर्णय पर अडिग रहा। अंततः अपनी जेब के अनुसार एक फ़्लैट मिल ही गया। कुछ जमापूंजी, पी. एफ. और बाकी बैंक से लोन लेकर फ़्लैट की पूरी कीमत अदा कर दी, एक अच्छा सा डिस्काउंट लिया और तीन साल में फ़्लैट के पूरा होने की प्रतीक्षा करने लगा। आज आठ वर्ष हो गए हैं और फ़्लैट अभी भी उतनी ही दूर है मुझसे, जितना उस मनहूस घड़ी में था, जब मैंने इसे खरीदने का निर्णय लिया था। जिस घर में रह रहा हूं, उसका किराया तो दे ही रहा हूं, घर के राशन से पहले हर महीने इस फ़्लैट के लिए जो लोन लिया था, उसकी किस्त का भुगतान कर रहा हूं आठ वर्षों से।

अभी अभी एक प्रॉपर्टी डीलर का फ़ोन आया था। उसने यह प्रस्ताव दिया है कि कोई पार्टी है जो इस फ़्लैट के बदले किसी अन्य बिल्डर का एक दूसरा फ़्लैट देने को तैयार है। साथ में बस, बीस लाख और देने होंगे। 

सोच रहा हूं, क्या डॉक्टर साब से भी उस गुंडे ने बीस लाख और मांगे होंगे? या फिर उस रुतबे वाले ने?


- नजदीक से

Friday, July 3, 2020

खिड़की के बाहर


पंछी नदिया पवन के झोंके
कोई सरहद ना इन्हें रोके
सरहदें इन्सानों के लिए हैं
सोचो तुमने और मैंने क्या पाया
इन्सां हो के ...

एफ.एम. रेडियो पर यह गाना बज रहा है। एक समय था मैं छायावाद से बहुत प्रभावित था। रेडियो पर बजता यह गीत सुनकर तो मानो हृदय हिलोरें लेने लगता था।

कभी मैं स्वयं को एक पंछी की भांति उड़ता हुआ अनुभव करता, दूर, सुदूर क्षेत्रों में, स्वच्छंद, मस्ती के साथ, बिना कुछ सोचे, चारों ओर विस्तृत प्रकृति का रसास्वादन करते हुए।

कभी मैं एक नदी बनकर बहता हुआ महसूस करता, कभी हिमखंडों के नीचे से चुपके से बह जाता तो कभी छलछल कर चट्टानों को काटते हुए मदमस्त बहता। कभी समतल पर कलकल कर नीरवता के साथ ध्यानावस्था में शांतचित्त बहता रहता तो कभी ऊबड़ खाबड़ धरती पर एक चंचल बच्चे की भांति हिलोलें मारता।

कभी मैं एक पवन का झोंका बन लोगों के चेहरों को स्पर्श करता हुआ आगे बढ़ जाता तो कभी उन्हें जीवनदायिनी श्वास देता हुआ बस, बहता रहता। कभी साथ में ऊष्मा लिए लोगों को सूर्य की शक्ति का अहसास कराता तो कभी बादलों के कणों को अपने आंचल में समेटे हुए उन्हें छूता और उन्हें भी अपनी तरह रूमानी बना देता।

अब इस गीत का वैसा असर मुझपर नहीं होता। यथार्थ मुझे वैसा कुछ सोचने ही नहीं देता। समय के साथ एड़ियां सख्त हो जाती हैं, त्वचा मांसपेशियों का साथ छोड़ने लगती है और हड्डियां अकड़ जाती हैं। जब उठकर बैठना मुश्किल हो जाए तो उड़ने के बारे में कोई कैसे सोचे!

मेरे कमरे की एक छोटी खिड़की बाहर गली में खुलती है। वह खिड़की बाहर की दुनिया से मुझे जोड़े रखती है।

दरअसल, यह पिताजी का कमरा है। इसे पिताजी के ज़माने में बैठक कहा जाता था। कमरे में एक तख्त है, एक शीशम की लकड़ी की मेज़ और दो कुर्सियां ही बची हैं। घर के पुनर्निर्माण के समय पिताजी वाले कमरे और बाहर के छोटे टॉयलेट को नहीं छेड़ा गया। उसे उसकी मूल सादगी के साथ पूर्ववत रहने दिया, 'सादा जीवन, उच्च विचार' के महान दर्शन के प्रतीक के रूप में।

पिताजी का मानना था कि बाहर के लोगों को यथासंभव घर के भीतर प्रवेश नहीं करना चाहिए। उस ज़माने में अधिकांश लोग ऐसा ही सोचते थे। टॉयलेट अलग होते थे और सोने के कमरे अलग। घर में सबसे बाहर एक टॉयलेट होता था और बाहर के लोग उसी टॉयलेट को प्रयोग करते थे। परिवारजनों के लिए टॉयलेट और बाथरूम भीतर अहाते में थे। बेड रूम्स के साथ अटैचड टॉयलेट के बारे में तो कोई सोच भी नहीं सकता था उन दिनों।

कितना अलग था हम लोगों का रहन सहन तब! मेहमान बाहर के टॉयलेट में हाथ मुंह धोकर ही भीतर आते। चप्पल जूते बाहर उतारते। सब हाथ जोड़कर अभिवादन करते, कोई हाथ नहीं मिलाता। भोजन में स्वाद से अधिक शुद्धता पर ज़ोर दिया जाता था। शायद यह संसार अब वापस उन्हीं आदर्शों को अपनाने को मजबूर हो जाएगा जिन्हें इसने तिरस्कृत कर दिया है।

अमेरिका की कुछ पत्रिकाओं और स्वयंसेवी संस्थाओं ने 'वॉलेंटरी सिंप्लीसिटी' नामक एक आंदोलन की शुरुआत की है, जो इसी सोच पर आधारित है कि सुविधाजनक विकल्पों के जाल में उलझने के बजाय हमें सीधी-सरल जीवनशैली अपनानी चाहिए। वहां का शिक्षित वर्ग इसका महत्त्व समझने भी लगा है। क्या हम भारतीय भी अपनी संस्कृति के महत्व को, उसकी बारीकियों को समझ पाएंगे? इस सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ और सबसे उन्नत जीवन शैली को पुनः अपना पाएंगे?

विज्ञान ने हमें बहुत कुछ दिया है। बहुत कुछ और भी देने की क्षमता है विज्ञान में। परन्तु विज्ञान को एक रोबोट की भांति देखा जाना चाहिए। जब तक रोबोट मनुष्य की बात मानता है, तब तक ही वह मनुष्य का हितकारी है, मनुष्य का मित्र है। जिस दिन स्वयं मनुष्य रोबोट के नियंत्रण में हो गया तो मनुष्य जाति की कैसी दुर्गति होगी इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। प्रकृति और मनुष्य के आपसी संबंध के परिप्रेक्ष्य में यह बात नितांत उलटी है। मनुष्य प्रकृति की देन है, प्रकृति का सृजन मनुष्य ने नहीं किया है। जब तक मनुष्य प्रकृति का सम्मान करता है, प्रकृति मनुष्य की रक्षा करती है, उसका लालन पालन करती है। जब मनुष्य प्रकृति को अपने वश में कर उसके प्रति असम्मान के भाव को व्यक्त करता है, प्रकृति मनुष्य को सबक सिखाती है।

विज्ञान, धर्म और संस्कृति अलग अलग नहीं हैं। इनका हाथ में हाथ मिलाकर चलना ही उचित है। वैसे भी, विज्ञान प्रकृति को समझने का एक प्रयास ही तो है। यही उद्देश्य धर्म और अध्यात्म का भी है।

एक अदृश्य वायरस ने पूरी मानव जाति को झिंझोड़ कर रख दिया है। इसकी चुनौती के सामने ज्ञान विज्ञान, धर्म अध्यात्म सब चुप रहने को मजबूर हैं और ईश्वरीय सत्ता के सामने नतमस्तक हैं।

रेडियो पर तो वह गीत कब का समाप्त हो चुका है परन्तु मैंने गूगल पर ढूंढ़कर उसे फिर चालू कर लिया है। आज मुझे इस गीत के रहस्य को सुलझाना है।

पंछी नदिया पवन के झोंके
कोई सरहद ना इन्हें रोके

हमारे महा उपनिषद् में भी तो कहा गया है:

वसुधैव कटुंबकम्

पूरा विश्व एक कुटुम्ब ही तो है। तो फिर ये सरहदें क्यों? क्यों मनुष्य को सीमाओं में बद्ध कर दिया गया है, एक दूसरे से काट दिया गया है?

बहुत देर से लघु शंका का दबाव पड़ रहा था किन्तु इस तपते शरीर को टॉयलेट तक लेे जाना? परन्तु जाना तो पड़ेगा।

बाहर का यह टॉयलेट बहुत समय से प्रयोग में नहीं था। कुछ वर्षों से मेहमान सीधे भीतर के ड्रॉइंगरूम में आते और भीतर के टॉयलेट्स का ही प्रयोग करते। बाहर के टॉयलेट में तो पुताई वालों की बाल्टी, कूंची, ब्रश और कुछ बचे और सूखे हुए पेंट के डब्बे रखे रहते थे। वर्षों से इस टॉयलेट में कब्जा जमाये इस सामान को बेघर कर मेरे उपयोग के लिए टॉयलेट को चालू कर दिया गया था।

इसी बैठक में बिछे तख्त पर, जहां पिताजी बैठकर स्वाध्याय करते, मनन करते और मित्रों के साथ बतियाते, राजनीति से लेकर दर्शनशास्त्र पर चर्चा करते थे, मैं पिछले कई दिनों से लेटा हुआ मैली छत को निहारता रहता हूं, दिन और रात। अब यही 100 वर्गफुट का कमरा मेरी दुनिया है। हद से हद मैं बाहर के टॉयलेट तक जा सकता हूं जहां से निवृत्त होकर मैं लौटा हूं।

मेरा स्मार्टफ़ोन इस कमरे में मेरा एकमात्र साथी है। यह स्मार्टफ़ोन भी कमाल की चीज है। शायद इन दिनों के लिए ही इस अद्भुत यंत्र का आविष्कार हुआ था। एक कमरे में बंद होते हुए भी पूरी दुनिया मानो अपने इशारे पर कमरे में ही आ जाती थी। फ़्री कॉल्स और तेज़ इंटरनेट के सहारे सब प्रियजनों से तार जुड़े हुए हैं।

फिर भी, इस पुराने डिज़ाइन के सादा कमरे की वह छोटी खिड़की जो बाहर गली की ओर खुलती है, बहुत आकृष्ट करती है। खिड़की के बाहर कोई दिखता नहीं, फिर भी निगाहें बरबस उधर ही जाती रहती हैं। जिस तख्त पर मैं बैठता, लेटता और अधलेटी अवस्था में पड़ा रहता हूं, वहां से यह खिड़की मुश्किल से आठ दस फुट की दूरी पर है, फिर भी मैं उस खिड़की के साथ पिताजी की प्रिय कुर्सी को लगाकर खिड़की के बाहर घूम रही हवा को महसूस करता रहता हूं, इंतज़ार करता रहता हूं कि शायद कोई व्यक्ति वहां से गुजरे और मैं उसे चलते हुए देख पाऊं।

एक रोज़ गुज़रा था एक पड़ोसी, मुंह ढककर। हाथ में थैला था। शायद सब्जी लेने जा रहा था। उसे दूर से ही देख सहसा एक मुस्कान आ गई थी मेरे चेहरे पर, परन्तु हाथों ने यंत्रवत खिड़की को बंद कर दिया। उसके बाद से खिड़की के पास बैठकर मानो मैं यही इंतज़ार करता रहता हूं कि कोई वहां से गुजरे और मैं खिड़की को बंद कर दूं।

सरहदें इन्सानों के लिए हैं...

सरहदें हैं तो जानवरों के लिए भी। फर्क सिर्फ़ इतना है कि उन्हें इनका भान नहीं है।

इन्हीं लॉकआउट के दिनों में एक तेंदुआ इन्सानों की सरहद में घुस आया था। कई इन्सान जख्मी हुए और तेंदुआ भी।

यह कोरोना की बीमारी भी तो इसीलिए आई कि इन्सान अपनी सरहद भूल गया था। खाद्य और अखाद्य में भेद भूल गया। पहले प्राणियों को खाना प्रारंभ किया और फिर कुत्ता, बिल्ली, सांप, टिलचिट्टे, चमगादड़ - सब खाने लगा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि इन्सान को अपनी सीमा लांघने का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा है। परन्तु इन्सान की कभी खत्म न होने वाली भूख उसे सीखने ही नहीं देती और वह बार बार अपनी सीमा लांघना चाहता है।

हो सकता है इस कोरोना वायरस का सीधा संबंध चमगादड़ों से न हो। हो सकता है इसे वुहान की लेबोरेटरी में बनाया गया हो। हो सकता है इसका कोई और ही स्रोत हो। जो भी हो, इसका सम्बन्ध इन्सान द्वारा अपनी सीमा लांघने से अवश्य है।

सरहदें इन्सानों के लिए हैं
सोचो तुमने और मैंने क्या पाया
इन्सां हो के ...

परन्तु यदि सोचने से ज़िन्दगी बदल सकती तो इन्सान से पहले बकरा सोचता कि उसने क्या पाया बकरा बनके? इन्सान का छुरा पाया? इन्सान की भूख का शिकार बनने को? इन्सान से पहले भैंसा सोचता, मुर्गा सोचता, सूअर सोचता, आसमान में उड़ने वाला वह पंछी सोचता। सबको तो इन्सान निगल जाता है। अब तो कोई भी जानवर सुरक्षित नहीं रहा, इन्सान की लपलपाती ज़ुबान के सामने।

वसुधैव कटुंबकम्।

क्या इस वसुधा में वह तेंदुआ शामिल नहीं है जो अपनी सरहद लांघ कर मनुष्य की सीमा में घुस आया था? क्या इस वसुधा में वे पशु पक्षी नहीं हैं जिन्हें अपनी जिह्वा की तुष्टि के लिए मनुष्य मार कर खा जाता है?

श्रीमती जी मेरे साथ मेरे कमरे में आना चाहती थीं, मेरी देखभाल के लिए। "इस बीमारी के समय इन्हें अकेला कैसे छोड़ दूं," उनका तर्क था। पिछले चालीस साल के विवाहित जीवन में, उंगलियों पर गिने जा सकें, इतने ही दिन रहे होंगे जब उन्होंने मुझे अकेला छोड़ा हो। अपने मायके भी जातीं तो मेरी खातिर अगले ही दिन वापस आ जातीं। बीमारी में अकेला छोड़ने का तो प्रश्न ही नहीं था।

कोविड 19 वायरस की बात कुछ और है। यह बीमारी कम और डर अधिक है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि इस बीमारी से मरने वालों की संख्या अधिक नहीं है। मात्र दो से पांच प्रतिशत रोगियों को ही यह रोग काल के मुख में धकेलता है। अन्य रोगी प्रायः ठीक हो जाते हैं इस लाइलाज बीमारी से। मरने वालों में अधिकांश 60 वर्ष से अधिक आयु के होते हैं, या फिर किसी लंबी अथवा गंभीर बीमारी जैसे मधुमेह अथवा कैंसर आदि से ग्रस्त व्यक्ति।

आम तौर पर हर दूसरे घर में साठ वर्ष से ऊपर की आयु का कोई तो व्यक्ति होता ही है। और हर दूसरे घर में कोई गंभीर बीमारी वाला भी। इसलिए हर घर में मौत की परछाईं अनुभव की जाती है। हर वयोवृद्ध व्यक्ति की तस्वीर पर माला डालने का समय आ गया, ऐसा महसूस किया जाता है।

जिन्हें हम आज सीनियर सिटिज़न के नाम से जानते हैं, हिन्दू मान्यताओं के अनुसार वह वानप्रस्थाश्रम कहलाता है, जब मनुष्य ईश्वर की उपासना की ओर गतिबद्ध हो जाता है और अपने सांसारिक उत्तरदायित्व का निर्वहन करता है। उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह परिवार में रहते हुए भी परिवार से दूरी बनाकर रखे और ईश्वर साधना एवं सामाजिक क्रियाकलापों में संलग्न रहे।

जब व्यक्ति अपने मोहपाश में बंधकर अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता तो प्रकृति उसे विवश कर देती है। परिवार से दूरी बनाने का समय आ गया था। साधना एवं ध्यान के लिए पर्याप्त समय मिलने वाला था। बच गए तो समाज के ऋणों से मुक्त होने का संकल्प भी आ रहा था मन में।

आशा ने अभी तक साथ नहीं छोड़ा है। मनुष्य के पास जब कोई उपाय नहीं बचता है तो वह आशा नाम के उपाय को गढ़ लेता है।

मधुमेह का रोग व्यक्ति को सभी चिकित्सा पद्धतियों का जानकार बना देता है। तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और विटामिन सी तो मैंने तभी लेना शुरू कर दिया था, जब तबलीगी जमात वाले डॉक्टरों का मखौल उड़ा रहे थे और मस्जिद में नमाज़ पढ़ते रहने पर अड़े हुए थे।

अलबत्ता, जमात की ताक़त का मुझे तब अंदाज़ा नहीं था। नहीं जानता था कि यह जमात मुझे भी संक्रमित कर सकती है, जबकि मेरा उससे कोई वास्ता ही नहीं था। बचपन में यही समझ में आया था कि जमात का अर्थ होता है कक्षा, जब कुछ बड़े पूछ लिया करते थे, "बेटा, कौन सी जमात में पढ़ते हो?" इससे अधिक जमात के बारे में मैं कुछ नहीं जानता था। मरकज़ में भी जमात लगती है, मुझे नहीं मालूम था।

मरकज़ के जमातियों ने किस क़दर सर में दर्द कर रखा था प्रशासन के, पुलिस के और स्वास्थ्यकर्मियों के, टीवी पर यह देख देख कर दुख होता था। क्या लाभ किसी भी जमात की किसी भी पढ़ाई का, यदि व्यक्ति अपने हित अहित में भेद भी न कर पाए! और कैसे कोई मनुष्य जानबूझकर अपने साथ औरों के प्राण भी संकट में डाल सकता है!

प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन घोषित करने से भी पहले हमारे परिवार ने स्वयं को अपने घर में बंद कर लिया था। तो मैंने कहां से पाया यह संक्रमण? पक्का तो कौन कह सकता है! पर लगता है राशन की या सब्ज़ी की दूकान से आया होगा। हो गई होगी कोई असावधानी खरीदारी करते समय! मोहल्ले में एक और व्यक्ति भी पीड़ित है इस रोग से। सुना है, उसका मिलना जुलना है तबलीगी जमात के लोगों से। सच तो शायद पुलिस को ही मालूम हो।

मेरे सामने अब दो चुनौतियां थीं, स्वयं को रोगमुक्त करना, जिसका कोई निश्चित उपाय नहीं था और यह सुनिश्चित करना कि मेरे कारण कोई और व्यक्ति संक्रमित न हो। इसी हेतु पिताजी की बैठक काम आ रही थी। इस रोग में रोगी का कमरा हवादार होना चाहिए और यह कमरा इस कसौटी पर खरा उतरता है।

बड़ी कठिनाई से पत्नी को मनाया। समझाया कि छूत के इस रोग से वह भी बीमार हो गईं तो क्या होगा? बच्चों को इस रोग से दूर रखने के लिए यह आवश्यक था कि वह मुझसे दूरी बना कर रखतीं। अंततः वह मान गईं। किसी भी मां को उसके बच्चों के नाम से किसी भी कार्य के लिए राज़ी किया जा सकता है।

मेरे और मेरे परिवार के बीच एक दरवाज़ा था जो सरहद थी, मेरे और उनके बीच, वायरस और स्वास्थ्य के बीच। इस सरहद का हम सबको सम्मान करना था, जीवन को बचाने के लिए।

शायरों के लिए कितना आसान होता है न, उस सरहद का उपहास उड़ाना जिसकी सुरक्षा के लिए हमारे देश के जवान कठिन से कठिन परिस्थितियों में जान की बाज़ी लगाते हैं। उनके त्याग और बलिदान के कर्जदार हैं हम, जो सरहद के भीतर आज़ादी की सांस ले पाते हैं।

पंछी नदिया पवन के झोंके
कोई सरहद ना इन्हें रोके।

वह सरहद ही तो है जहां जवान के सीने दुश्मन की गोली को रोककर उसे हम तक नहीं पहुंचने देते; जहां वह गोली का जवाब गोली से देकर हमारी सुरक्षा करते हैं।

दरवाज़े रूपी सरहद के उस पार से मेरा परिवार मेरे लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था और इस पार से मैं उन सबके लिए। जब भी उधर से मेरी कुशल क्षेम पूछी जाती, एक फौजी की भांति मेरा एक ही उत्तर होता, "ठीक है।"

परन्तु सब ठीक नहीं था।

पहले दिन से ही मेरा गला पका हुआ था, सूखी खांसी आ रही थी, नाक सूखी हुई थी और हलका ज्वर था।

मैं नहीं चाहता था कि मेरी पत्नी भावावेश में अपनी सरहद को लांघ कर मेरे कमरे में आए। इसलिए मैं उन्हें अपनी तबीयत के बारे में झूठ बताता रहा। सारे लक्षण कोविड 19 के थे, जिसका इलाज था स्वयं को सबसे अलग कर लक्षणों की रोकथाम करना। मरीजों से पटे अस्पताल में जाकर उनका बोझ बढ़ाने का कोई औचित्य न था, विशेषकर जब कोई इलाज ही नहीं था इस बीमारी का। वैसे भी, मधुमेह से पीड़ित होने के कारण भोजन आदि का विशेष ख्याल रखना आवश्यक था जो महामारी के चलते अस्पताल में हो पाना कठिन था। इसलिए हमने निर्णय लिया कि घर में ही रहकर सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार उपचार किया जाए।

पत्नी समय पर दरवाज़ा थोड़ा खोलकर भोजन आदि भीतर सरका दिया करती। साथ ही दिन में दो बार श्वासारी क्वाथ भी उबाल कर नियमित रूप से देती थीं। तुलसी, गिलोय और अश्वगंधा का सेवन तो बीमारी के पहले से ही जारी था।

दिन प्रतिदिन ज्वर बढ़ता जा रहा था और बदन में असहनीय पीड़ा थी। ज्वर कम करने के लिए तो मैं एलोपैथिक दवा लेे रहा था। आवश्यक था कि साथ में ठंडे पानी की पट्टियां भी होती। चूंकि मैं परिवार से ज्वर तेज़ होने की बात छुपा रहा था, इसलिए कमरे में ठंडे जल या बरफ की व्यवस्था नहीं हो सकती थी। सादे जल की पट्टियां मैं स्वयं कर रहा था किन्तु वे उतनी प्रभावी नहीं थीं।

रात को योगनिद्रा के सहारे मैं कुछ घंटों की नींद ले पाता था। दिन में जब बन पड़ता, प्राणायाम करता।

फिर भी मेरी अवस्था बिगड़ती जा रही थी। ज्वर कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

पांच छह दिन हो चुके थे। प्रतीक्षा थी चार पांच दिन और बीतने की जिसके बाद सुधार की आशा थी। परन्तु अब मुझे श्वास लेने में भी कठिनाई होने लग गई। रात होते होते लगा कि अब श्वास नहीं लिया जा सकेगा। हार कर मैंने अपने पारिवारिक डॉक्टर को फ़ोन लगाया। मेरी स्थिति की जानकारी लेकर उन्होंने सरकारी अस्पताल के डॉक्टर से बात की और मुझे सूचित किया कि संभवतः मुझे वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ेगी जिसके लिए मुझे अगले रोज़ अस्पताल में भरती होना ही पड़ेगा।

फ़ोन काटने के बाद मुझे लगा कि शायद मैं वेंटिलेटर पर जाने से पहले ही कूच कर जाऊंगा।

योग की कक्षाओं में सीखी कुंजल क्रिया का स्मरण आया। कमरे में बिजली की एक केतली रखी थी। पहले दिन से ही मैं गर्म पानी का सेवन ही कर रहा था। सुना था, यह वायरस गर्मी से मर जाता है। उस रात मैं पानी गर्म करता गया और नमक डाल कर छह सात गिलास गर्म पानी पी गया। फिर बहुत कठिनाई से टॉयलेट तक गया और पिया हुआ सारा पानी बाहर उड़ेल दिया। साथ ही, ऐसा लगा, शरीर में जमा विष भी निकल गया हो। वापस तख्त पर आ निढाल होकर लेट गया। दो तीन घंटे बाद नींद खुली तो ज्वर लगभग सामान्य था। दो या तीन दिन के बाद ज्वर टूटा था। अब मुझे श्वास लेने में भी कोई कठिनाई नहीं थी।

योगनिद्रा की सहायता से रात भर सोया रहा। सुबह उठते ही डॉक्टर को फ़ोन लगाकर अपने स्वास्थ्य की सूचना दी और उनसे अनुरोध कर अस्पताल जाने के कार्यक्रम को रद्द कराया।

लगता तो यही है कि खतरा टल गया है। परिवार और मेरे बीच बनी सरहद का उल्लंघन हममें से किसी ने नहीं किया है। अब तक परिवार स्वस्थ है जिससे लगता तो यही है कि सरहद का सम्मान करने से मेरा परिवार बच गया है।

सरहद इतनी अधिक महत्त्वपूर्ण है तो वसुधैव कुटुम्बकम् मंत्र का क्या?

अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम् | उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् |

अर्थात उदार मन वालों के लिए यह पूरी धरा एक परिवार के समान है। तेरा-मेरा तो संकुचित मन वाले करते हैं।

तो इन सरहदों के साथ इस धरा का बंटवारा क्यों?

क्या यह धरा स्वयं बंटवारा नहीं करती? कल्पना कीजिए कि इस धरा पर जल और थल के बीच में सरहद न हो! एक हो जाएं जल और थल! कल्पना कीजिए कितना भयावह होगा यह दृश्य! इसे ही तो हम प्रलय के नाम से जानते हैं। जब तक जल और थल के बीच सरहद है, तब तक ही यह जीवन है।

और क्या यह धरा हमें इस रोग के माध्यम से यह संदेश नहीं दे रही कि हम सब अपनी मर्यादा में रहें? स्वेच्छा से तो हम ऐसा करते नहीं। इसलिए प्रकृति हमें मजबूर कर रही है अपनी मर्यादा को समझने के लिए, उसका सम्मान करने के लिए। और देखो आज प्रकृति कितनी प्रसन्न है! पक्षी चहचहा रहे हैं, नदियों का जल निर्मल हो गया है, आकाश नीला हो गया है, सैकड़ों किलोमीटर की दूरी से पर्वतश्रृंखलाएं दिख रही हैं!

विगत दो दशकों में विश्व में उदारीकरण का दौर चला। हमने देखा कि विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे पर निर्भर हैं। इस उदारीकरण से सभी अर्थव्यवस्थाओं को लाभ भी हुआ। और इससे उपजी वैश्विक गांव की अवधारणा। यदि ऐसा हो सके तो यह एक आदर्श स्थिति होगी।

परन्तु क्या यह संभव है, व्यावहारिक है? अब तो यूरोपीय संघ भी विघटित हो चला है। भाषा, खानपान, परंपरा और सांस्कृतिक भिन्नता इस अवधारणा पर भारी है।

वायरस की इस समस्या से जनित इस परिस्थिति से अपेक्षित तो यह था कि पूरा विश्व एक हो जाता और मानवजाति पर आई इस विपदा का मिलकर सामना करता। परन्तु क्या ऐसा हुआ? हुआ इसके ठीक विपरीत। इस समस्या ने पूरे विश्व को दो फाड़ कर दिया। चीन का विरोध करने में तो अमेरिका और प्रायः सभी यूरोपीय देश एक दिखते हैं परन्तु अपने अंतर्निहित स्वार्थों के चलते वे सब अलग हैं।

वैश्विक गांव की अवधारणा उतनी ही अव्यावहारिक है जितना मनुष्य का पंछी अथवा पवन बनकर उड़ना। संस्कृति ही हमारे जीवन को आधार देती है। विभिन्न संस्कृतियों का समन्वय तो संभव है, और बहुत हद तक वांछित भी, परन्तु सब संस्कृतियां स्वयं को समाप्त कर किसी एक संस्कृति में विलुप्त हो जाएं, यह संभव नहीं। सरहदें दिलों को बांटें, जैसा कि किसी भी साम्राज्यवाद में होता है, उससे तो बेहतर हैं राजनैतिक सरहदें, भौतिक सरहदें।

मेरे कमरे का वह दरवाज़ा जिसके पार मेरा परिवार है, उसकी रक्षा के लिए ही तो इसे सरहद बनाया है हमने! यह सरहद कुटुम्ब की रक्षा करती है, इसका बंटवारा नहीं। सीमाएं मर्यादा सुनिश्चित करती हैं। कुटुम्ब हो या विश्व, यह टूटता तब है जब इन मर्यादाओं को तोड़ा जाता है। मर्यादाएं रिश्तों की हों या भौतिक, राजनैतिक हों अथवा प्राकृतिक, इनका सम्मान करना ही श्रेयस्कर है, इनकी रक्षा करने में ही मनुष्यमात्र की सुरक्षा है।

कल अस्पताल जाना है। टेस्ट करवाकर पता लगाना है कि मैं अभी कोरोनामुक्त हुआ कि नहीं।

कल यदि अनुकूल रिपोर्ट आ भी गई तो क्या जीवन पहले जैसा हो पाएगा? शायद नहीं। प्रकृति स्वयं अपना परिसीमन बदलती रहती है। सुना है, हिमालय भी अपने स्थान से हिलता रहता है। 'पहले जैसे' से इतना मोह क्यों? वसंत ऋतु के बाद ग्रीष्म ऋतु आती है, फिर वर्षा ऋतु, उसके बाद शरद ऋतु, हेमंत ऋतु, शिशिर ऋतु और उसके बाद पुनः वसंत ऋतु। यही तो नियम है प्रकृति का।

छोटी खिड़की के पार कुछ परछाइयां हिलती दिख रही हैं। मुंह पर रूमाल रखकर दूसरी ओर देखने का समय आ गया है।


Monday, March 5, 2018

गुंडे-मवाली


एक दिन मैं अपनी गली की एक दूकान पर खड़ा कुछ सामान ले रहा था. एक युवक वहाँ आकर रुका. बिखरे बाल. सीने के बटन खुले हुए. गुंडे-मवालियों जैसा अंदाज़. वह एक अन्य युवक को धमका रहा था. अचानक उसकी नज़रें मुझसे मिलीं. वह कुछ अचकचा-सा गया और अपनी बात को संक्षेप में समाप्त कर दूसरे युवक को गाली देकर चला गया. मुझे उसका चेहरा परिचित सा लगा किन्तु स्मरण नहीं आया कि वह कौन था और मुझे देखकर असहज क्यों हो गया था.

उस घटना के बाद वह युवक मुझे अकसर गली में दिखने लगा. खुले बटन. लोफरों वाला अंदाज़. पास से गुज़रता तो पता नहीं क्यों दिल करता कि मैं उसे रोक कर उससे बात करूं. उसे कुछ सलाह दूं. किन्तु वह युवक मेरे प्रति उदासीन, सीना फुलाए कमीज़ के कालर उठाये, पास से गुज़र जाता. 

एक दिन रात को सोने से पहले मैं उसके बारे में सोच रहा था. यकायक मुझे उस युवक का स्मरण हो आया. यह तो वही युवक था, जो मुझे जब भी मिलता, बहुत सम्मान के साथ मुझे नमस्कार किया करता था. कारण? एक बार कुछ दिनों तक परीक्षा के दिनों में मैंने गली के कुछ युवा छात्रों की पढ़ने में सहायता की थी. उन युवाओं में एक वह भी था.

पढ़ाई के दौरान वह अधिक उत्साह नहीं दिखाता था. चुपचाप बैठा रहता था. संभवतः वह अपने परिणाम को लेकर अधिक आशावान नहीं था. समयाभाव के कारण मैं भी उसकी पढ़ाई में अलग से कोई रूचि नहीं ले पाया था. पता नहीं, वह पास भी हुआ था कि नहीं, मुझे इसकी जानकारी भी नहीं मिली. बस उसका और मेरा इतना ही सम्बन्ध था कि वह मुझे सम्मान के साथ नमस्ते करता और मैं मुस्कुरा कर उसे उत्तर देता. वर्षों बीत गए. वह युवक अब दिखाई नहीं देता था. मैं भी उसे भूल चुका था. 

जो हमेशा झुक कर सम्मानपूर्वक अभिवादन किया करता था, उसमें इतना बदलाव! चेहरा वही, फिर भी इतना अलग व्यक्तित्त्व! अब मुझे समझ आया कि क्यों वह चेहरा मुझे इतना आकृष्ट करता था; क्यों मैं उसके बारे में इतना सोचता था.

अगली बार जब मुझे वह दिखा तो मैंने उसे बुला लिया. उसके लिए यह अप्रत्याशित था. उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह मुझसे कैसे व्यवहार करे. उसकी छवि एक गुंडे-मवाली की थी किन्तु मुझसे बात करते समय उसे अपना पुराना स्वरूप स्मरण हो रहा था और वह इस ऊहापोह से निकल नहीं पा रहा था. मेरे बुलाने पर उसने मुझे अभिवादन तो किया किन्तु उसमें पहले जैसा सम्मान नहीं था. अकड़ थी. 

थोड़ी बातचीत के बाद वह संयत हुआ. मैंने उसे अपने घर चलने को कहा. मेरे इस प्रस्ताव पर पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि मैं उस गुंडे को अपने घर चलने के लिए कह रहा था. 

घर पहुँचने पर मेरे सामने वही वर्षों पहले वाला नवयुवक बैठा था. राकेश नाम था उसका. मासूम. झुकी हुई आँखों में नमी. दो-चार मिनटों की बातचीत के बाद वह रो रहा था – बच्चों की तरह. आज कहूं तो उसकी कहानी एक घिसी-पिटी फ़िल्मी कहानी की भाँति थी. किन्तु मैं स्वयं उसकी कहानी का साक्ष्य था. बस इतना नहीं, मैं जानता था कि वह नवयुवक भी उस कहानी का एक प्रमुख पात्र था.

हमारी गली का वातावरण बहुत तनावपूर्ण था उस दिन. पूरी गली वर्दीधारी पुलिस वालों से भरी हुई थी. सुनने में आया, कुछ गुंडे फ़ौजदारी करके छुपे हुए थे किसी घर में. सब लोग अपने-अपने घरों में सहमे हुए दुबके थे. घर-घर की तलाशी ले रही थी पुलिस. खबरों-अफ़वाहों का बाज़ार गरम था. बैंक डकैती से लेकर एक बड़े नेता की ह्त्या तक की अफ़वाहें थीं. किसी छोटी-मोटी वारदात से तो पुलिस हरकत में आती नहीं.

एक खबर जिसकी बाद में पुष्टि भी हुई, यह थी कि युवकों के दो गुटों में झगड़ा हो गया था. बात बिगड़ गयी और एक युवक का सर फूट गया. संयोग से जिस युवक का सर फूटा था, वह एक पुलिस अधिकारी का पुत्र था. अब पुलिस दूसरे गुट के एक-एक युवक को चुन-चुन कर पकड़ रही थी, उन्हें प्रताड़ित कर रही थी.

थोड़ी देर में खबर आयी कि गली के एक घर में कुछ युवक सचमुच छुपे हुए थे और पकड़े गये थे. उन युवकों में एक राकेश भी था, इसकी जानकारी मुझे नहीं थी.

“पुलिस ने हमें बहुत पीटा, थाने में. तब तक, जब तक हम उनके लगाए सभी आरोपों को मान नहीं गये – चाहे वे सच्चे थे अथवा मनगढ़ंत. हम पर पैसे लूटने, चोरी करने और चाकू से हमला करने जैसे आरोप लगाये गये. हमने उस लड़के को मारा ज़रूर था, किन्तु मारा तो उन्होंने भी था हमें. हममें से एक लड़के ने, जो बहुत पिट रहा था, पत्थर उठाकर दे मारा एक लड़के के सर, और उसके सर से खून निकलने लगा. चाकू को तो हमने कभी हाथ भी नहीं लगाया था, सिवाय सब्ज़ी काटने वाले चाकू के,” राकेश रोते-रोते बता रहा था अपनी आपबीती.

“अदालत में खून लगा चाकू भी था और अनेक गवाह भी. हमें सज़ा हो गयी – उस अपराध के लिए, जो हमने नहीं किया था.

“जेल में हमें कई तरह के लोग मिले. गुंडे-मवालियों से लेकर वर्दी-वाले गुंडे. सबने वहां हमसे दुर्व्यवहार किया.

“जेल से बाहर आकर हम सामान्य जीवन जी सकें, इसका सवाल ही नहीं है. कोई हमसे सीधे-मुँह बात ही नहीं करता. घर में भी नहीं. घर में तो सब मुझे गुंडा-मवाली कहते हैं. कॉलेज जाने की आयु रही नहीं. काम कोई देता नहीं. सिर्फ़ गुन्डागर्दी की ट्रेनिंग है हमें. तो गुंडा-मवाली बनने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं रहा,” शून्य में ताकता हुआ बोल रहा था वह.   

राकेश कसम खा कर कह रहा था कि जिन अपराधों की सज़ा उसे मिली थी और जेल से बाहर आकर भी मिल रही थी, उनमें से कोई भी अपराध उसने नहीं किया था. मुझे उसकी आँखों में सच्चाई दिख रही थी. मुझसे झूठ बोलने का कोई कारण भी नहीं था.

अब मेरी नज़रें झुकी हुई थीं. साहस नहीं हो रहा था उसकी ओर देखने का. कौन था ज़िम्मेदार उसकी इस त्रासदी का? वह स्वयं, जो पढ़ाई के स्थान पर आवारागर्दी करता था? पुलिस वाले, जिन्होंने उसे अपराधी बनाया? उसके परिवारवाले, जिन्होंने उसे आवारागर्द बनने दिया? शिक्षा-व्यवस्था? या समाज जो अपराधी का ठप्पा लगे व्यक्ति से या तो डरता है या नफ़रत करता है. उसे अपनाता नहीं.